मक्के की खेती को लेकर दक्षिण राजस्थान मुफीद है। इस खेती के लिए किसानों को आगे आना चाहिए। इसका अधिक उत्पादन करने से रोजगार के साधन यहां पर बढ़ेंगे और किसानों की आय में भी इजाफा होगा। ये बात मैज मैन ऑफ इंडिया डा.साई दास ने पत्रिका से बातचीत में कही। उन्होंने कहा कि राजस्थान पर्यटकों का स्थल है। ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को फ्रेश मक्का नहीं मिल पाता है। यदि इसका उत्पादन राजस्थान में बढ़ाएंगे तो डेयरी प्रोडक्शन बढ़ेगा, रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे। प्रस्तुत है मधुसूदन शर्मा बातचीत के प्रमुख अंश:-
पत्रिका: दक्षिण राजस्थान में मक्का को लेकर किस तरह की संभावनाएं देखते हैं।
जवाब: मक्का दक्षिण राजस्थान के लिए बहुत उपयोगी है। ये ऐसी फसल है। जिसे डेयरी में भी इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान टयूरिस्ट स्थान है। यहां आने वाले लोगों को फ्रेश मक्का चाहिए। इसके बेहतर उत्पाद स्वीट कोर्न, बेबी कोर्न और पोपकोर्न की डेयरी लगा सकते हैं। ये बाहर से मंगवाते हैं तो फ्रेश नहीं होते। यहां उगाएंगे तो ये फ्रेश होता है। यहां डेयरी प्रोडक्शन होगा, रोजगार के साधन भी बढ़ेंगे। इस फसल को साल में दो बार लिया भी जा सकता है।
पत्रिका: मक्का उत्पादन में राजस्थान अब चौथे नंबर पर आने का क्या कारण रहा।जवाब: राजस्थान पहले मक्का उत्पादन में देश में दूसरे नंबर पर था। इसका कारण ये रहा कि राजस्थान का कुछ इलाका सोयाबीन में शिफ्ट हो गया है। क्योंकि यहां इण्डस्ट्रीज नहीं होने से किसानों को इसके उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिल पाया। इस कारण राजस्थान अब चौथे नंबर पर आ गया। लेकिन अब सरकार ने स्कीम चला दी है। जिसका लाभ किसान ले सकते हैं।
पत्रिका: सीड्स प्रोक्शन को लेकर क्या राय है।
जवाब: दक्षिण राजस्थान में सीड प्रोडक्शन का बड़ा स्कोप है। सीड प्रोडक्शन को लेकर तापमान और क्लाइमेट ऐसा है। सीड जब हार्वेस्ट होता है पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट के टाइम हाई इम्यूनिटी और तापमान कम नहीं होता है। जो सीड्स उत्पादन में कारगर है। यहां सीडस प्रोडक्शन होता है तो सीड कंपनियां आएंगी। किसानों को आर्थिक लाभ मिलेगा। किसानों को गुणवत्ता वाला सीड्स मिलेगा। किसानों को कम पैसा देना पड़ेगा।
पत्रिका: मक्का खरीफ फसल है, यहां बारिश की कमी रहती है। ऐसे में कौनसी किस्मे लगाई जाए।
जवाब: हाइब्रीड मक्के की स्ट्रंेथ है। मक्का सर्दी में लगाएं तो लोंग रेसन का लगांए। तो पैदावार अधिक होगी। मक्का वाइल्ड क्लाइमेटी है। क्योंकि मक्का का तापमान बढ़ता है तो सर्दी का उस पर असर नहीं पड़ेगा और पैदावार में कोई परेशानी नहीं होगी। इसी कारण गेहूं का 80 प्रतिशत बांसवाड़ा का हिस्सा मक्के की खेती में कनवर्ट हो गया है।
पत्रिका: एमपीयूएटी ने माही कंचन और माही धवल किस्म विकसित की, लेकिन किसान इसके बीज को लेकर चिंतित है।
जवाब: पब्लिक व प्राइवेट सेक्टर के हाइब्रीड बाजार में उपलब्ध है। लेकिन भारत में जितनी कंपनियां है। उनका हाइब्रीड के उत्पादन पर रुझान नहीं है। इस कारण किसान परेशान है। यदि यहीं पर हाइब्रीड का उत्पादन करेंगे तो मल्टीनेशनल कंपनियां आएंगी। किसानों को भी गुणवता युक्त मक्के का बीज मिलेगा। क्योंकि दक्षिण राजस्थान के लिए मक्के की खेती मुफीद है।