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अब मेवाड़ के क‍िसान भी मशरूम उत्पादन से हर साल कर रहे लाखों की आमदनी, करीब डेढ़ हजार किसानों ने अपनाया

मेवाड़ के किसान भी मशरूम उत्पादन का अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं।

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अब मेवाड़ के क‍िसान भी मशरूम उत्पादन से हर साल कर रहे लाखों की आमदनी, करीब डेढ़ हजार किसानों ने अपनाया

उदयपुर . महंगी सब्जियों में शामिल मशरूम अब अमीरों की थालियों से निकल कर मध्यम वर्ग की रसोई तक पहुंच गया है। शाकाहारी परिवारों के लिए प्रोटीन के श्रेष्ठ विकल्प होने के नाते अब उदयपुर में मशरूम की मांग बढऩे लगी है। इसको देखते हुए मेवाड़ के किसान भी मशरूम उत्पादन का अपनाकर अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं। अखिल भारतीय समन्वित मशरूम विकास परियोजना के प्रभारी डॉ. श्यामसुन्दर शर्मा ने बताया कि संभाग के 205 चयनित किसान ऐसे हैं, जो हर साल करीब 5 क्विंटल से ज्यादा उत्पादन करते हैं जिससे उन्हें हर साल 5 से 7 लाख रुपए की आय होती है। खर्च निकालने के बाद 70 से अस्सी प्रतिशत तक राशि बचती है।

हर साल करीब सौ टन उत्पादन
डॉ. शर्मा ने बताया कि संभाग में करीब डेढ़ हजार किसान हर साल सौ टन मशरूम उत्पादन करते हैं। बड़े किसानों के अलावा सामान्य किसान भी हर साल 50 हजार से 1 लाख रुपए तक कमा लेते हैं। संभाग से उत्पादित मशरूम प्रदेश सहित अन्य राज्यों में बिक्री के लिए जाती है। सरकार अप्रेल 2018 से 40 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है जिससे गरीब किसान मशरूम उत्पादन कर हर माह 4 से 5 हजार रुपए कमा सकते हैं। प्रदेश में करीब 1300 किसान ऐसे हैं, जो हर साल क्विंटलों में मशरूम उत्पादन करते हैं।

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विकसित की नई किस्में
मशरूम को बढ़ावा देने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 1993 में देश की 12वीं मशरूम परियोजना राजस्थान कृषि महाविद्यालय में शुरू की। अखिल भारतीय समन्वित मशरूम विकास परियोजना में राजस्थान, गुजरात व मध्यप्रदेश में मशरूम को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया जाता है। परियोजना समन्वक डॉ. शर्मा ने बताया कि परियोजना के तहत ढिंगरी व डेजर्ट की उन्नत उत्पादन तकनीक विकसित की गई। डेजर्ट मशरूम की किस्म उदयपुर में तैयार की, जो अब तक केवल पश्चिमी राजस्थान में होती थी मगर अब मेवाड़ में भी होने लगी है। विश्व की पहली दूध छाता मशरूम एवं औषधीय मशरूम की भी किस्म विकसित की है।


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