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नई खोज : प्रागैतिहासिक काल में हो चुका था साइकिल का निर्माण

Archaeological Survey : पुरातत्वविदों में मतांतर, देश में पहली बार देखे गए ऐसे शैल चित्र

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बूंदी जिले के पलकां गांव के पास नाले में पुरातत्वविदों ने शैल चित्रों में साइकिल जैसी आकृति की खोज की है।

उदयपुर . बूंदी जिले के पलकां गांव के पास नाले में पुरातत्वविदों ने शैल चित्रों में साइकिल जैसी आकृति की खोज की है। इसे देखकर खोजकर्ताओं का मानना है कि प्रागैतिहासिक काल में ही मानव ने शिकार या आमोद प्रमोद के लिए इसकी खोज की होगी। हालांकि इस पर सभी पुरातत्वविद एकमत नहीं है। खोजकर्ताओं का दावा है कि इस प्रकार की साइकिल जैसी आकृति वाला शैल चित्र भारत में अब तक कहीं नहीं देखा गया है।

दरअसल इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) के उदयपुर चेप्टर से जुड़े पुरातत्वविदों का दल पिछले कुछ समय से बूंदी के शौकिया पुरातत्वविद ओमप्रकाश कुक्की के खोजे गए शैल चित्रों के विस्तृत अध्ययन में जुटा हुआ है। अध्ययन दल के अनुसार हाड़ौती क्षेत्र खासकर बूंदी जिले के पलकां गांव में पाए गए शैल चित्रों को यहां निवासरत आदिमानव ने विभिन्न कालखंडों में बनाया होगा। इनमें से कुछ शैल चित्र मध्य पाषाण युग (10000 वर्ष ई.पू. से लेकर 5000 वर्ष ई.पू. तक) तथा ज्यादातर ताम्ब्र पाषाण युग (५००० वर्ष ई.पू. से लेकर 1200 वर्ष ई.पू.) के लगते हैं।

पुरातत्वविद डॉ.ललित पाण्डेय के अनुसार खोज के दौरान एक शैल कंदरा में दीवार पर शैल चित्रों का समूह देखा गया। जिसमें मानवीय आकृतियां, गाय, बैल, बकरी, भैंस, हिरण, कुत्ता आदि के साथ चक्र एवं ज्यामिति आकृतियां पाई गई। इन शैल चित्रों का जब सूक्ष्म अध्ययन किया गया तो एक चौकाने वाला दो इंच लम्बा शैल चित्र देखा, जिसमें दो पहिए स्पष्ट रूप से बने हैं, जो साइकिल जैसे प्रतीत होते हैं। जिस पर एक मानव आकृति बैठी हुई है। पुरातत्वविद ओम प्रकाश कुक्की के अनुसार ये आकृति विशिष्ट है और जिज्ञासा उत्पन्न करती है।

अध्ययन दल में शामिल भू वैज्ञानिक प्रो.डॉ.विनोद अग्रवाल ने कहा कि इस शैल चित्र के बारे में कुछ अन्य पुरातत्वविदों से भी राय ली गई। जिन्होंने इसे अनोखा एवं रोचक बताया। कुछ का मानना है कि ये चित्र साइकिल का न होकर किसी रथ या बैलगाड़ी का हो सकता है। क्योंकि इस पर हेंडल नहीं है। संभव है यह बाद के काल में चित्रित किया गया हो। हालांकि अध्ययन दल के पुरावेत्ताओं मानना है कि पहियों की स्थिति समानांतर नहीं होकर आगे-पीछे होने से यह साइकिल का प्रारंभ स्वरूप अधिक प्रतीत होता है। चूंकि मध्य पाषाण काल तथा ताम्रयुग में मानव ने पहियों का उपयोग सीख लिया था तो ऐसी दो पहिया वस्तु भी बनाई होगी, जो साइकिल जैसी दिखती होगी।

अध्ययन दल के सदस्य डॉ. हेमंत सेन के अनुसार तमिलनाडू के पंचवर्णस्वामी मंदिर ,जो सातवीं शताब्दी ई का है, उसकी दीवार पर भी एक मूर्ति ऐसी देखी गई है, जिसमें एक व्यक्ति साइकिल पर सवार है संभवत:वह भी दो, पहिए युक्त वाहन ही हो, संभवत:पलकां में देखा गया यह शैलचित्र उत्तर ताम्रपाषाण युग (लगभग 1500 ई.पू.) का है। हालांकि इसकी स्पष्ट काल गणना रेडियो कार्बन डेटिंग से ही हो सकती है। खोजकर्ता दल का यह भी मत है कि भविष्य में ऐसे ही अन्य अज्ञात तथ्यों की जानकारी विस्तृत अध्ययन के पश्चात् और अधिक उपलब्ध हो।| यह भीलवाड़ा-बिजोलिया- बूंदी बेल्ट पुराइतिहास का एक जीवंत प्रमाण है तथा इसका सरकार के स्तर पर व्यापक संरक्षण अपरिहार्य है।