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उदयपुर में लगा पुणे आई बाघिन का मन- पुणे से उदयपुर आने के बाद चार दिन सुस्त रही दामिनी- कुछ दिन में ढल

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Super Admin

Feb 28, 2015

उदयपुर। उदयपुर में लगा पुणे आई बाघिन का मन- पुणे से उदयपुर आने के बाद चार दिन सुस्त रही दामिनी- कुछ दिन में ढल गई उदयपुर की आब-ओ-हवा मेंमुकेश हिंगड़ . उदयपुर. महाराष्ट्र के पुणे चिडियाघर में पली-बढ़ी बाघिन दामिनी अब मेवाड़ की आब-ओ-हवा में ढलने लगी है।



पुणे से उदयपुर के बायोलॉजिकल पार्क में लाए जाने के बाद वह चार दिन सुस्त रही। एक दम नई जगह आई दामिनी इनदिनों चुस्त-दुरूस्त नजर आ रही है।


अब तक केयरटेकर के मराठी लहजे वाले आदेश मानने वाली यह बाघिन उदयपुर आकर अपने नए "मास्टर" रामसिंह की मेवाड़ी मिश्रित हिंदी के आदेशों का पालन करने लगी है।


पुणे के राजीव गांधी जुलोजिकल पार्क से गत आठ फरवरी को दामिनी को यहां सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क में लाया गया, तो वह उदास थी।


यह क्रम अगले चार दिन तक चलता रहा। केयरटेकर रामसिंह पिंजरे के पास जा कर उसे कमांड देता रहा, लेकिन वापस निराश लौटता रहा।


दामिनी उसकी आवाज पर कोई हरकत नहीं कर रही थी। यहां तक कि उसने चार दिन कुछ नहीं खाया। इस पर उसे सूप दिया गया था। धीरे-धीरे दामिनी यहां के महौल में ढलने लगी।


पहले लपक कर आतीदामिनी
जब यहां लाई गई, तब पिंजरे में से भी केयरटेकर रामसिंह पर झपटती थी। रामसिंह ने प्रतिदिन घंटों मेहनत कर मुश्किल से उसके गुस्से का काबू किया।


अब दामिनी मेवाड़ी भाषा भी समझने लगी है। आदेश पर उठने-बैठने के साथ ही पिंजरे से बाहर जा व आ रही है। यहीं नहीं, बॉयोलोजिकल पार्क में निरीक्षण के लिए नियमित जाने वाले वन विभाग के अधिकारियों को भी पहचाने लगी है।


भेडिए के बदले मिली थी दामिनीवन विभाग ने एक्सचेंज कार्यक्रम के तहत उदयपुर से एक नर भेडिए को पूणे भेजा था। वहां से बाघिन दामिनी को लाया गया था। सज्जनगढ़ बॉयोलोजिकल पार्क में शीघ्र ही बेनरघाटा (बैंगलूरू) चिडियाघर से एक नर बाघ लाया जाएगा।


एक्सपर्ट व्यू..
जानवरों का स्वभाव भी मनुष्य जैसा ही होता है। जगह बदलने पर जानवरों के लिए भी सब कुछ नया होता है। आसानी से वहां उनका मन नहीं लगता है।


धीरे-धीरे महौल मुफीद लगने लगता है और वह उस माहौल में ढल जाता है। वन्यजीवों को किसी दूसरे शहर से लाया जाता है, तब उनको क्रेरेन्टाइन प्रक्रिया में रखा जाता है।


इससे वन्यजीव की थकान भी दूर हो जाती है और वह धीरे-धीरे सब समझने लग जाता है।
- डॉ. सतीशकुमार शर्मा, वन्यजीव विशेषज्ञ