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राजस्थान का एक ऐसा गांव जहां प​क्षियों के  संरक्षण के लिए समर्पित हैं ग्रामीण, यहां हर घर में बर्ड हाउस

परिंडे और प्राकृतिक घोंसले मिलेंगे, गोरैया को उपलब्ध कराते हैं आवास- बच्चों से लेकर बड़े तक कर रहे गोरैया संरक्षण के प्रयास, स्कूलों में भी किया जा रहा प्रेरित

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मधुलिका सिंह/उदयपुर. देश का आदर्श गांव कहलाने वाला राजसमंद जिले का पिपलांत्री ना केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में अपने पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों के लिए जाना जाता है। उदयपुर से करीब 75 किलोमीटर दूर इस गांव में जाते ही यहां पक्षियों की चहचहाहट आपको इनकी मौजूदगी का अहसास करा देगी। दरअसल, यहां एक भी ऐसा घर नहीं है जहां गोरैया का आना-जाना ना हो। यहां के ग्रामीण गोरैया संरक्षण के प्रति इस तरह समर्पित हैं कि उनके लिए हर घर में परिंडे लगा रखे हैं, दाना-चुग्गा और पानी की व्यवस्था भी है। वहीं, इस काम में बड़ों के साथ बच्चे भी मुस्तैदी से लगे रहते हैं। यही कारण है कि एक तरह से ये घर भी उनके आवास ही हैं और वे इन घरों की सदस्य जहां वे बेखौफ आती-जाती हैं व घोंसले भी बनाती हैं।

5000 की आबादी और हर घर में गोरैया

पिपलांत्री गांव के पूर्व सरपंच व पद्मश्री से सम्मानित श्याम सुंदर पालीवाल और उनकी पत्नी व वर्तमान सरपंच अनीता पालीवाल ने बताया कि इस गांव की एक नहीं बल्कि कई खासियते हैं। यहां बेटियों के जन्म पर 111 पौधे लगाने की शुरुआत आज से 25 साल पहले हुई थी और पूरे गांव की इस प्रकृति बचाओ मुहिम ने गांव की कायापलट कर रख दी। इन सालों में करीब 2 लाख पेड़ लगे तो यहां पक्षियों का बसेरा भी हो गया। करीब 5000 की आबादी वाले इस गांव के हर घर में गोरैया के लिए परिंडे लगाए गए हैं । उनके मित्र क़ृष्ण गोपाल परिंडे, बर्ड हाउस व प्राकृतिक घोसले बांटने का काम करते हैं। साथ ही ग्रामीण उनके दाना-पानी की व्यवस्था भी करते हैं। खुद खाने से पहले गोरैया व अन्य पक्षियों को निवाला देना नहीं भूलते।

देश व दुनिया भर के लोग व बच्चे हर दिन कर रहे विजिट

पालीवाल ने बताया कि पिपलांत्री गांव देश व दुनिया में चर्चित हो चुका है। विदेशों में यहां के आदर्श गांव मॉडल को पढ़ाया जा रहा है। कई लोग यहां डॉक्यूमेंट्री बनाने आते हैं तो कई यहां विजिट के लिए आते हैं। देश, राजस्थान व संभाग भर से स्कूली बच्चों को भी यहां लाया जाता है। ऐसे में उन्हें भी पर्यावरण संरक्षण, गोरैया संरक्षण आदि सभी की जानकारी दी जाती है। यहां के स्कूलों में भी बच्चों को गोरैया संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता है।


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