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Interview… ‘अब सिर्फ हमारे सिर पर बाल हैं और बच्चे अंग्रेजी शिक्षा पाकर विदेश चले गए हैं’

-अंग्रेजी के बढ़ते चलन से खफा बालकवि बैरागी बोले  

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Interview

उदयपुर . अंग्रेजी के बढ़ते चलन से बेहद खफा ख्यात रचनाकार बालकवि बैरागी ने कहा कि अब स्थिति यह हो गई है कि जैसे हम अक्सर अपने परिवार के साथ बाल-बच्चों का जिक्र करते हैं परन्तु अब सिर्फ हमारे सिर पर बाल हैं और बच्चे अंग्रेजी शिक्षा पाकर विदेश चले गए हैं।

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वे शनिवार को कवि सम्मेलन के लिए लेकसिटी के मेहमान बने थे। इस मौके पर उनसे साहित्यकार डॉ. महेन्द्र भानावत ने बातचीत की। राजभाषा हिन्दी की दशा-दिशा के बारे में बालकवि ने कहा कि हिंदी पर लता मंगेशकर और भारतीय रेल का बड़ा उपकार है और रहेगा। जैसे लताजी के हिंदी गानों को सुनने के लिए कई अहिंदी भाषियों ने हिंदी सीखी। वैसे ही देशभर में करोड़ों यात्रियों को रोज अपने गंतव्य तक पहुंचाने वाली भारतीय रेल हर प्रांत में हिन्दी के शब्द लेकर जाती है और बदले में क्षेत्रीय भाषा का कोई न कोई शब्द अपने में समाहित कर ले आती है।

हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के संघर्ष के सवाल पर बैरागी ने कहा कि इस देश में वो ही हिंदी काम करेगी और उसी हिंदी का अस्तित्व बचेगा जिसे गैर हिंदी भाषी लोग काम में लेंगे। हिंदी के पैरोकार बनने से पहले हम खुद तो हिंदी को ठीक से बोल, समझ और सीख लें! राजभाषा का नियम कहता है कि अंग्रेजी में पत्र लिखा है और हस्ताक्षर हिंदी में किए गए हैं तो आपको उत्तर हिंदी में मिलेगा। अगर हिंदी में पत्र लिखा है और हस्ताक्षर अंग्रेजी में किए हैं तो उत्तर अंग्रेजी में आयेगा। राजभाषा अधिनियम में वर्णित राजस्थान राज्य ‘क’ श्रेणी में आता है। नियमानुसार यहां हर होर्डिंग, संकेतक, पत्र, आदेश आदि पहले हिंदी में व उसके बाद आवश्यकता हो तो अंग्रेजी में लिखा जाना चाहिए।

मुझे सुनना है तो वे दुभाषिया रखें
बालकवि ने संस्मरण सुनाया कि एक बार वे एक महीने के लिए जर्मनी गए तो लोगों ने पूछा कि आप सिर्फ हिंदी बोलते हैं। वहां आपको भाषा की समस्या आएगी। इस पर बालकवि ने कहा कि यह समस्या जर्मनी वालों की है जिन्होंने मुझे बुलाया, मेरी नहीं है। मुझे समझना है तो वे दुभाषिया रखें।

विदेशों में हिंदी के प्रयोग के संदर्भ में बालकवि ने बताया कि वे 18-20 देशों में घूमे हैं मगर कहीं भी अंग्रेजी के शब्द का उपयोग नहीं किया। हिंदी आदान-प्रदान की भाषा है। कुछ शब्द हम दें, कुछ शब्द उधार लें फिर देखिये भाषा का मर्म कितने सुंदर अंदाज में सबके दिलों को जीत लेता है। संघर्ष राजभाषा का है, राष्ट्रभाषा का नहीं। राष्ट्र भाषा निर्ववाद रूप से हिंदी है। हिन्दी धैर्य की भाषा है, उत्तेजना की नहीं। इसे अपनी गति से बरसों-बरस आगे बढ़ते रहने का मौका देना चाहिए।

विरोध प्रदर्शन से फिल्म की पब्लिसिटी
फिल्म पद्मावती को लेकर देशभर में हो रहे विरोध के बीच ख्यात रचनाकार बालकवि बैरागी बोले ‘हालांकि, मुझे इस बारे में ज्यादा पता नहीं लेकिन एेसे विरोध प्रदर्शन से फिल्म की जबर्दस्त पब्लिसिटी हो गई है। अब भारत में भले ही यह फिल्म चले या न चले, विदेशों में करोड़ों कमाएगी।’