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स्पीड बोट का तेल और धुआं खा जाएगा वेटलैण्ड और पक्षियों का प्रवास

पिछोला में अवैध मानवीय गतिविधियों का पड़ रहा प्रतिकूल असर, पर्यावरणविदों में बढ़ रही चिंताएं

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स्पीड बोट का तेज और धुआं खा जाएगा वेटलैण्ड और पक्षियों का प्रवास

स्पीड बोट का तेज और धुआं खा जाएगा वेटलैण्ड और पक्षियों का प्रवास

आज भी पेशोला के-
तरल जल मंडलों में,

वही शब्द घूमता सा-
गूंजता विकल है

किन्तु वह ध्वनि कहां?
गौरव की काया पड़ी माया है प्रताप की

वही मेवाड़!
किन्तु आज प्रतिध्वनि कहां है?

उदयपुर. हिन्दी के ख्यातनाम कवि जयशंकर प्रसाद की पिछोला झील को केन्द्र में रखकर लिखी इन पंक्तियों में राणा प्रताप का गौरव, उदयपुर का अभिमान यहां की खूबसूरत झील और इस वक्त इन पर मण्डराते खतरे के विरुद्ध प्रतिध्वनि की अपेक्षाएं झलकती हैं। दशकों पहले की गई कवि की कल्पना आज भी प्रासंगिक लगती हैं। तब के हालातों में, आज पिछोला के संदर्भ में।
पिछोला की खूबसूरती और इसके पारिस्थितिकीय तंत्र को वाकई में बड़ा खतरा पैदा हो चुका है। यहां होटल कारोबारियों द्वारा उतारी गई अवैध जेटी और धड़ल्ले से चल रही स्पीड बोट के धुएं-तेल से जलीय जीवन और आबोहवा के लिए बेहद खतरनाक है।

पर्यावरण के जानकार व सुखाडिय़ा विवि में व्याख्याता डॉ. देवेन्द्र सिंह बताते हैं कि शहर में पिछोला व मेनार तालाब इस इलाके के खास वेटलैण्ड हैं। शहरी क्षेत्र होने के बावजूद पिछोला में प्रवासी पक्षियों का हर साल जमावड़ा लगा रहता है। हजारों किलोमीटर की उड़ान भरकर आए प्रवासी पक्षी यहां ठहरते हैं तथा प्रजनन क्रिया के बाद वापस अपने देश लौट जाते हैं। यहां का वेटलैण्ड अभी तक उनके लिए अनुकूल है बना हुआ है, लेकिन बढ़ती अवैध मानवीय गतिविधियां अब चिंताए पैदा करने लगी हैं। पानी और पर्यावरण की उनके लिए आदर्श गुणवत्ता प्रभावित होने पर न केवल प्रवासी पक्षियों की दिलचस्पी घट सकती है, बल्कि यहां के जलीय जीवों का जीवन भी संकट में पड़ रहा है।
- धुआं, तेल रिसाव और होटलों के वेस्ट से घटती है ऑक्सीजन

पिछोला में पेट्रोल-डीजल चलित अवैध स्पीड बोट व नावों से बड़े पैमाने पर धुआं निकलता है, वहीं फ्यूल का रिसाव होने पर वह पानी में स्थायी रूप से घुल जाता है। यही नहीं, दिन और रात में बोट पार्टी के दौरान खाने-पीने की चीजें, होटलों से निकल रहा वेस्ट और कई जगह सिवरेज पानी की गुणवत्ता बिगाड़़ रहा है।
- पुष्कर झील में खाने के दानों से मरी थीं हजारों मछलियां

पानी में ऑर्गेनिक पदार्थ, मल-मूत्र, सड़ी-गली चीजें व पानी की गुणवत्ता खराब करने वाले तत्वों के घुलने से ऑक्सीनजन की मात्रा खतरनाक स्तर तक घट जाती है। ऑक्सीजन के सुपोषीकरण से जलीय जीवों के लिए आवासीय वातावरण प्रतिकूल हो जाता है। बैक्टिरिया लगातार फैलते जाते हैं और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। धार्मिक महत्व की प्रसिद्ध पुष्कर झील पर मई, 2015 में देशभर से पूजा-अर्चना के लिए एकत्र हजारों श्रद्धालुओं द्वारा पूजा व खाद्य-सामग्री डालने से बड़ी मात्रा में मछलियों की मौत हो गई थी।
पानी के एरिएशन में समाधान

जानकार बताते हैं कि पानी के अंदर काई हटाने की प्रक्रिया को नियमित करना चाहिए। साथ ही फव्वारे लगाने से पानी हवा में फैलकर वापस जलाशय में गिरता है, जिससे हवा में से ऑक्सीजन सोखता है। ऐसा करके पानी की ऑक्सीजन मात्रा बढ़ाई जा सकती है। जितने ज्यादा फव्वारे लगाए जाएंगे, उतनी ऑक्सीजन का स्तर सुधरेगा। फव्वारे दर्शनीय भी लगते हैं।