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राजस्थान के उदयपुर में 330 करोड़ साल पुराने पत्थर, अंदर दबाए हैं पृथ्वी के रहस्य, शोध के लिए आते हैं देशभर से स्टूडेंट्स

उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान संग्रहालय में 330 करोड़ साल पुराने पत्थर और 450 करोड़ साल पुराने उल्कापिंड संरक्षित हैं। यहां 1260 खनिज, 612 जीवाश्म सहित हजारों नमूने पृथ्वी के रहस्यों को उजागर कर शोध व विद्यार्थियों के अध्ययन का प्रमुख केंद्र बने हैं।

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Rajasthan 330 Crore Year Old Rocks in Udaipur Reveal Deep Secrets of Earth

संग्रहालय में संग्रहित करोड़ों साल पुराने पत्थर (फोटो- पत्रिका)

उदयपुर: प्रकृति के करोड़ों सालों के राज जानने हो तो मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय का भू-विज्ञान विभाग का संग्रहालय आपके लिए एकदम सही जगह है। यहां 330 करोड़ साल पुराने पत्थरों, खनिजों और जीवाश्मों का एक अनूठा संसार सजा हुआ है।

संभवतः प्रदेश का यह पहला संग्रहालय है, जहां प्रकृति के रहस्य और खजाना मौजूद हैं। यह संग्रहालय दुनिया भर के शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इन रहस्यों को समझने के लिए वैज्ञानिक निरंतर शोध कर रहे हैं। उदयपुर में 1950 में भू-विज्ञान विभाग की स्थापना हुई थी। यह संग्रहालय भी करीब छह दशक पुराना है।

पत्थर और उल्कापिंड आकर्षण का केंद्र

इस संग्रहालय की सबसे बड़ी खासियत यहां रखा 330 करोड़ साल पुराना पत्थर है, जिसे उदयपुर के झाड़ोल क्षेत्र से जुटाया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार, यह पत्थर पृथ्वी के शुरुआती समय का है। इसके अलावा यहां 450 करोड़ साल पुराने दो उल्कापिंड भी संग्रहित हैं, जो ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों को समझने में सहायक बन रहे हैं। इसमें जिक, लेड, चांदी और तांबे के कच्ची धातु के नमूने भी रखे हुए हैं। इसके साथ ही जैम स्टोन का संग्रह भी संग्रहालय की खूबसूरती बढ़ा रहा है।

संग्रहालय में संग्रह

  • कुल मॉडल- 82
  • कुल जीवाश्म- 612
  • कशेरुकी जीवाश्म- 60
  • मानचित्र- 06
  • चार्ट- 03
  • शैल/चट्टानें- 768
  • खनिज- 1260
  • रत्न- 122
  • फोटो- 34

संग्रहालय में करोड़ों साल पुराने पत्थर संग्रहित हैं। पत्थरों के शोध से ही हमें पृथ्वी की आंतरिक संरचना में होने वाले बदलावों, खनिजों की स्थिति और पृथ्वी की आयु का पता चलता है। यह संग्रहालय विद्यार्थियों के शोध और अकादमिक अध्ययन के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। देशभर से छात्र यहां शोध के लिए आते हैं।
-रितेश पुरोहित, विभागाध्यक्ष, भू-विज्ञान विभाग