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जानिए, सरदार पटेल ने महाराणा भूपाल सिंह से आखिर क्‍यों क‍िया था दिल्ली चलने का निवेदन

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जानिए, सरदार पटेल ने महाराणा भूपाल सिंह से आखिर क्‍यों क‍िया था दिल्ली चलने का निवेदन

उदयपुर. यह अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना संभवत: 14 जनवरी 1949 की है, जब देश की स्वतंत्रता के बाद नए भारत के निर्माण में रात-दिन तल्लीन लौहपुरुष सरदार पटेल की उदयपुर में मेवाड़ राज्य के अंतिम शासक महाराणा भूपालसिंह से भेंट हुई। सरदार पटेल जब महल में पहुंचे तो महाराणा के आग्रह-अनुरोध के बावजूद उन्होंने आसन ग्रहण नहीं किया और खड़े-खड़े ही हाथ जोडकऱ निवेदन किया द्ग ‘महाराणा साहब! हम तो आपको दिल्ली ले जाने के लिए आए हैं, चलिए दिल्ली का सिंहासन संभालिए। आपके पूर्वजों द्वारा देशहित में दी गई कुर्बानियों से ही तो आज यह अवसर आया है।’
सरदार पटेल ने अपनी बात इतनी सरलता, सहज भाव, निष्कपट और गंभीरता से कही कि महाराणा की आंखें डबडबा उठी। उस दिल्ली, जिसके सिंहासन के सामने सिर न झुकाने के शर्त के कारण मेवाड़ के सिसोदिया 1400 वर्ष तक रक्त तथा जौहर से अपनी कुर्बानियां देते रहे, वही दिल्ली और उसका सिंहासन आज उनके सामने तश्तरी में सत्ता लिए हाजिर था। यह थी चित्तौड़ और बप्पा रावल के मेवाड़ के प्रतिशोध की अंतिम विजय। और, उसी दिन से उदयपुर के महाराजा भूपालसिंह नए राजस्थान, जिसमें सम्मिलित होने के लिए जयपुर, बीकानेर और जैसलमेर रियासतें भी सैद्धांतिक रूप से सहमत हो चुकी थीं, महाराज प्रमुख कहलाए और हैदराबाद के निजाम राजप्रमुख।
जिन लोगों को राजपूताने के इतिहास का तनिक भी ज्ञान है, उन्हें मेवाड़ और जयपुर के राजघरानों की लम्बे समय से चली आ रही कटुता का अवश्य भान होगा। ऐसी स्थिति में करीब दो दर्जन रियासतों की सीमा समाप्त कर नए बनने वाले राजस्थान की राजधानी जयपुर को बनाने के लिए मेवाड़ को सहमत करना टेढ़ी खीर थी, पर यह सरदार पटेल ही थे जिनकी निश्छल देशभक्ति पूर्ण अभिव्यंजना पर मुग्ध हो भूपाल सिंह ने सहज ही जयपुर को नए राजस्थान की राजधानी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
इससे पूर्व डूंगरपुर व बांसवाड़ा नरेश जब जैसलमेर, जोधपुर और बीकानेर नरेशों की अपनी-अपनी रियासतों को स्वतंत्र राज्य बनाए रखने की लालसा या पाकिस्तान के साथ विलय की अफवाहों से प्रभावित हो मेवाड़ के महाराणा से परामर्श हेतु पहुंचे तभी उन्होंने स्पष्ट कह दिया था द्ग ‘उनके लिए तो इस संबंध में निर्णय का अधिकार और अवसर ही कहां है? यह निर्णय बहुत पहले ही उनके पूर्वज समरभूमि में अपने तरुण और ऊष्म रक्त से अंकित कर गए हैं। इससे थोड़ा भी विचलित होना उनके लिए संभव नहीं है।’ महाराणा के कहने का अभिप्राय यह था कि ‘बप्पा रावल का वंशधर तो कभी भी और किसी भी काल में पाकिस्तान के साथ नहीं जा सकता।’ महाराणा के इस उत्तर से डूंगरपुर व बांसवाड़ा नरेश सकपका गए। उनके पास कहने के लिए बचा ही क्या था।
अपने समय के जाने-माने साहित्यकार और पत्रकार विष्णुदत्त मिश्र ‘तरंगी’ ने उदयपुर के प्रख्यात साहित्यकार जनार्दनराय नागर से प्रश्न किया था कि महाराणा भूपालसिंह का दुर्लभ गुण क्या है तो उनका उत्तर था द्ग ‘नि:स्वार्थ प्रजा-हित चिंतन।’ और अपने इसी परम्परागत गुण के कारण स्वदेश हित में मेवाड़ के अभिमान के प्रतीक उदयपुर को नए राजस्थान की एकता के मंदिर में समर्पित कर दिया।