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रियासत कालीन हेरिटेज लुक वाली ओदियां खो रही हैं अतीत की आभा…महाराणाओं के शिकार के लिए बनी ओदियां दुर्दशा की शिकार

अनदेखी से वैभवशाली धरोहरें बन रही खंडहर

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रियासत कालीन हेरिटेज लुक वाली ओदियां खो रही हैं अतीत की आभा...महाराणाओं के शिकार के लिए बनी ओदियां दुर्दशा की शिकार

मानवेन्द्र सिंह राठौड़/उदयपुर . रियासत काल में मेवाड़ के जंगलों में शिकार के लिए बने हेरिटेज लुक वाले हटिंग पाइंट या शूटिंग बॉक्स यानी ओदियां रख-रखाव के अभाव में अपनी आभा खोती नजर आ रही है। पुरा महत्व की यह धरोहरें उस काल खण्ड के इतिहास की गवाह है, जहां महाराणाओं एवं राज परिवार के सदस्य शिकार करते थे। सार-संभाल एवं जीर्णोद्धार के अभाव में आज ये शूटिंग बॉक्स और इनसे सटे महल अपने वैभवशाली इतिहास पर आंसू बहा रहे हैं। इन विरासतों को संरक्षित कर इको ट्यूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकता है मगर प्रशासन एवं सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।रियासत काल में करीब 200 वर्ष के अंतराल में उदयपुर, राजसमंद, चित्तौडगढ़़ एवं पाली के घने जंगलों में पहाड़ों के बीच चोटियों पर शिकार के लिए सामंती लिबास में सौ से अधिक ओदियों का निर्माण हुआ। इनमें से अधिकतर ओदियों की हालत जर्जर है जिनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है। कहीं ओदियों के गुम्बद व कंगूरे टूट रहे हैं तो कहीं दीवारें क्षतिग्रस्त है। वन्यजीव अभयारण्यों में जरूर कुछ ओदियों का जीर्णोद्धार हुआ है लेकिन इन धरोहरों को संरक्षण की दिशा में किसी सरकार ने व्यापक पहल नहीं की है। बजट के अभाव में वन विभाग भी गए इन हटिंग पाइंट के संरक्षण और संवर्धन के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाया है जिससे यह विरासत खण्डहर में तब्दील हो रही है। इन स्थलों के पास महाराणाओं के आराम के लिए महल भी बने हुए हैं। जयसमंद में पहाड़ी पर बना हवा महल और रूठी रानी का महल भी रख-रखाव के अभाव में अपना अस्तित्व खो रहे हैं।

रानियां भी जाती थीं शिकार पर
रियासत काल में महाराणाओं के साथ उनके परिजन भी शिकार के लिए जाया करते थे। राज-परिवार की महिलाएं भी साथ रहती थीं। बाघदड़ा, बेदला, बिजयपुर व जयसमंद में बनी जनाना ओदियां इसके प्रमाण है। सेवानिवृत्त वन अधिकारी राहुल भटनागर व प्रतापसिंह चुण्ड़ावत के अनुसार जनाना ओदियां बड़ी खूबसूरत बनी हुई हैं। महाराणाओं के साथ महाराज कुमार, रानी साहिबा भी शिकार करते थे और वे ओदियों से जंगली जानवरों को निहारते थे। महाराणा भूपालसिंह क ी बड़ी पत्नी को निशाने साधने में महारथ हासिल थी। चित्तौडगढ़़ के पास बिजयपुर घाटे में बनी ओदियां रख-रखाव के अभाव में खस्ताहाल हैं। तीन मंजिला महलनुमा ओदी समाजकंटकों का अड्डा बन गई है। महल खण्डहर हो रहे हैं। दीवारों का प्लस्तर गिर रहा है।

जंगलात के साथ था शिकार विभाग

करजाली पूर्व ठिकाने के 89 वर्षीय निर्भयसिंह करजाली के अनुसार रियासत काल में दो विभाग हुआ करते थे। इसमें एक जंगलात व दूसरा शिकार विभाग था। शिकार विभाग के कर्मचारी महाराणा को शिकार की जानकारी देते थे, तब महाराणा लाव-लश्कर के साथ शिकार के लिए निकलते थे। महाराणा के जंगल में बैठने व शूटिंग के लिए ओदियां बनाई गई थी। है। 12-15 फीट की ऊंचाई पर ओदियां बनाने का मकसद यह रहा कि महाराणा शिकार के दौरान सुरक्षित रहें।

महाराणा फतहसिंह ने बनवाई सर्वाधिक ओदियां

जानकारों के अनुसार महाराणा फतहसिंह शिकार के शौकीन थे और उनकेजमाने में सर्वाधिक ओदियां बनाई गई। इनमें उदयपुर शहर के आसपास माछला मगरा पर तीन, पिछोला झील के किनारे खास ओदी, सीसारमा के पास नार ओदी, सज्जनगढ़ में आठ, बाघदड़ा में तीन, बेदला के पास शिकारगाह पहाड़ पर तीन, जयसमंद में आठ, सज्जनगढ़ के कलेर वन खण्ड में खीला माछड़ा व बदणिया मथारा ओदी, उदयसागर, नाहरामगरा, मटून, झामर कोटड़ा, ईसवाल, जावरमाइंस, गोगुंदा, कुंभलगढ़, दिवेर, रूपनगर, चित्तौडगढ़़, बस्सी, भैंसरोडगढ़, मांड़लगढ़ समेत 100 से अधिक महलनुमा आदियां शामिल हैं।

इको ट्यूरिज्म के रूप में विकसित हो


पर्यावरण प्रेमी व सेवानिवृत्त वन अधिकारी डॉ. सतीश कुमार शर्मा ने बताया कि ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने व उनके संवर्धन की जरूरत है। इनसे मेवाड़ का गौरवशाली इतिहास जुड़ा है। अभयारण्यों से बाहर बनी ओदियों की हालत ज्यादा खराब है। जीर्णोद्धार करवा कर इनसे इको ट्रिज्म को बढ़ावा देना चाहिए

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