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जल्द ही सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में दिखेगा जिराफ का जोड़ा

उदयपुर के सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में जल्द ही मैसूर से जिराफ का जोड़ा लाने की तैयारी चल रही है। वन विभाग एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत इसके बदले भेड़िए या सियार भेज सकता है। जिराफ आने से पार्क को नई पहचान मिलेगी और देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए बड़ा आकर्षण बढ़ेगा।

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giraffe pair comes from mysore zoo

file photo

उदयपुर. सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीव प्रेमियों को जल्द ही जिराफ का जोड़ा देखने को मिल सकता है। वन विभाग ने इसके लिए मैसूर जू एवं वन्यजीव प्रबंधन से संपर्क कर नर-मादा जिराफ उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भेजा है। हालांकि अब तक वहां से औपचारिक जवाब नहीं आया है, लेकिन विभागीय स्तर पर प्रयास जारी है।वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार जिराफ को एक्सचेंज प्रोग्राम के तहत लाने की योजना बनाई गई है। इसके बदले उदयपुर से भेड़िए या सियार (जैकाल) भेजे जा सकते हैं। यह प्रक्रिया वन्यजीव आदान-प्रदान समझौते और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अनुमति के तहत होगी। यदि मंजूरी मिलती है तो सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क राजस्थान के चुनिंदा पार्कों में शामिल हो जाएगा जहां पर्यटक जिराफ को देख सकेंगे।

अफ्रीका का सबसे ऊंचा वन्यजीव

अब तक सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में जिराफ नहीं है। ऐसे में यह जोड़ी पार्क की सबसे बड़ी आकर्षण बन सकती है। जिराफ दुनिया का सबसे ऊंचा वन्यजीव है। इसकी ऊंचाई 18 फीट तक होती है। लंबी गर्दन इसकी सबसे बड़ी पहचान है। जिराफ की चाल, शांत स्वभाव और ऊंचे पेड़ों की पत्तियां खाने की शैली बच्चों से लेकर विदेशी पर्यटकों तक को आकर्षित करती है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि जिराफ किसी भी जू या बायोलॉजिकल पार्क की पहचान बढ़ाने वाले जानवरों में शुमार है।

मिल सकती है नई पहचान

अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क में पहले से कई वन्यजीव मौजूद हैं, लेकिन जिराफ जैसा विदेशी और दुर्लभ आकर्षण नहीं है। पार्क में वर्तमान में हिरण, चीतल, चिंकारा, पैंथर सहित कई वन्यजीव पर्यटकों को लुभाते हैं। वहीं टाइगर को लेकर भी समय-समय पर चर्चाएं हैं, लेकिन उसके लिए विशेष अनुमति और अलग व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है। वन विभाग का मानना है कि जिराफ आने से उदयपुर आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए यह नया आकर्षण केंद्र बन सकता है।

मैसूर से जवाब का इंतजार

वन्यजीवों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया देशभर के चिड़ियाघरों और बायोलॉजिकल पार्कों में सामान्य मानी जाती है। इसके तहत एक पार्क दूसरे पार्क को अपनी उपलब्ध प्रजातियां देकर नई प्रजातियां प्राप्त करता है। मैसूर का चिड़ियाघर भारत के उन चुनिंदा और बेहतरीन चिड़ियाघरों में से एक है, जो अपने जिराफों के लिए सबसे ज्यादा मशहूर है और यहां इनका सफल प्रजनन भी होता है, वहां से अगर जिराफ मिलते है तो उदयपुर से भेड़िये या सियार भेजने की योजना भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। अधिकारियों का कहना है कि इससे दोनों संस्थानों में वन्यजीव विविधता बढ़ती है और प्रजनन प्रबंधन में भी मदद मिलती है। फिलहाल पूरे मामले में मैसूर से जवाब का इंतजार किया जा रहा है।