
पूरब और पश्चिम की छटाओं का मिलन
उदयपुर. आमतौर पर शिल्पग्राम उत्सव में पहले ही दिन से मेलार्थियों का हुजूम उमड़ता है, लेकिन इस बार उद्घाटन के दूसरे ही दिन इतवार की छुट्टी होने के बावजूद मेले में अपेक्षानुरूप रंगत नजर नहीं आई। हालांकि, इस बारे में शहरवासियों का कहना था कि बड़े दिन
की छुट्टियों के साथ ही मेला पूरी रंगत पा लेगा।
इधर, दस दिवसीय उत्सव के दूसरे दिन कला प्रांगण में दिनभर देसी-विदेशी सैलानियों की आवाजाही से हाट बाजार गुलजार नजर आया। जहां महिलाओं की भीड़ वस्त्र संसार, अलंकरण व ऊनी व गर्म परिधानों की स्टॉल्स पर रही। वहीं, युवाओं सहित बच्चों ने मेले में खाने-पीने का आनन्द भी उठाया।
उत्सव के खास आकर्षण के रूप में शाम को मुक्ताकाशी मंच पर लोक कलाकारों ने पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत के राज्यों की पारम्परिक कला संस्कृति का अनूठा प्रदर्शन किया।
जिसमें मिजोरम का चेरो नृत्य, आेडीशा का संबलपुरी नृत्य और पुरूलिया छऊ कलाकारों के पौराणिक कथाओं के प्रसंग ने दर्शकों पर खासा असर छोड़ा। वहीं, किशनगढ़ की गूजर बालाओं का ‘चरी नृत्य’ असम का ढाल थुंगड़ी, गुजरात की आदिम जाति का डांगी नृत्य, राजस्थान का कालबेलिया नृत्य के अलावा रविवारीय सांझ में दर्शक दीर्घा में बैठे दर्शकों ने विभिन्न लोक वाद्यों से सजी ‘झंकार’ की प्रस्तुति का जमकर आनंद उठाया। जिसमें तंतु वाद्य, फूंक वाद्य, धातु वाद्य आदि की ध्वनियों का कलात्मक मिश्रण तथा आरोह अवरोह श्रेष्ठ बन सका।
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल एवं पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के अध्यक्ष कलराज मिश्र दूसरे दिन भी शिल्पग्राम पहुंचे जहां उन्होंने अलवर के नूरूद्दीन मेवाती के भपंग वादन को खूब सराहा।
Published on:
23 Dec 2019 12:49 pm
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