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थाणा में संदिग्ध नारू रोगी मिलने की सूचना से हड़कंप

- सीएमएचओ बोले सूचना गलत- भेजा जांच दल

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थाणा में संदिग्ध नारू रोगी मिलने की सूचना से हड़कंप

थाणा में संदिग्ध नारू रोगी मिलने की सूचना से हड़कंप

भुवनेश पण्ड्या

उदयपुर. जिले की सराड़ा तहसील के थाणा गांव में संदिग्ध नारू रोगी की सूचना फैलते ही चिकित्सा महकमे में हड़कंप मच गया। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के ब्लॉक अधिकारियों से रोगी का परीक्षण कर पूर्ण रिपोर्ट देने के निर्देश के बाद पहुंचे दल ने जांच कर रिपोर्ट दी कि मामला स्पष्ट नहीं है। हालांकि मामले में जांच दल के सदस्य का कहना है कि जब तक नारू निकलते नहीं देखा जाए इसकी पुष्टि करना मुश्किल है। सीएमएचओ इसे साफ तौर पर नकार रहे हैं।
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शुक्रवार सुबह 70 साल के लालू राम पुत्र कमल कलाल निवासी थाणा के सीधे पैर के अंगूठे के नीचे फ फोला हुआ और उसके फूटने के बाद वहां सफेद धागे जैसा निकला था। 30 वर्ष पहले लालूराम के नारू निकला था। जैसे ही सूचना विभाग तक पहुंची तो चिकित्सा दल में डॉ. राघवेन्द्र राय व नारू रोग पर शोध करने वाले मीरा कन्या महाविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष डॉ एस एल चौबीसा के साथ वहां पहुंची। रोगी को गिनी वर्म का अंदेशा जताया गया है।
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रोगी से कहा कि जब निकले तब बुलाना
टीम में पहुंचे चिकित्सकों का कहना है कि जब तक नारू फि र से अपनी पूंछ बाहर नहीं निकालता और वे अपनी आंखों से देख नहीं लेते तब तक नारू रोग की पुष्टि वे नहीं कर सकते। ऐसे में रोगी को सलाह दी गई है कि जब कोई धागा निकलने लगे तो चिकित्सा विभाग को पहले सूचना जरूर दें।

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नारू नहीं है, डर के मारे खोद डाला

इस मरीज के 30 वर्ष पहले वर्म निकला था। मरीज ने अंगूठे वर्म के बारे में जानकारी दी। ये अनपढ़ व उम्रदराज है। डर के मारे खुद मरीज ने ही कुरेद-कुरेद कर वहां घाव बना दिया है, नारू का उन्मूलन हो चुका है। ये नारू नहीं है।
डॉ राघवेन्द्र राय, डिप्टी हैल्थ चिकित्सा विभाग उदयपुर

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मरीज ने बताया कि जो धागा निकला वह तोड़ दिया। तोडऩे से वह वापस अंदर चला जाता है, दूसरी जगह से फिर निकला था, उसने खोदकर निकालने का प्रयास किया है, वह टूट गया। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने वहां नारू देखा है, हालांकि जब तक हम हमार आंखों से नारू निकलता हुआ नहीं देख लें तब तक इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। क्योंकि डब्ल्यूएचओ ने वर्ष 2000 में और राज्य सरकार ने 1997 में इसका उन्मूलन कर दिया था, हालांकि उन्मूलन की घोषणा के बाद में डूंगरपुर जिले में कुछ मामले मिले थे।

शांतिलाल चौबीसा, शोधकर्ता, सेवानिवृत्त व्याख्याता, मीरा कन्या महाविद्यालय