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अकबर मेवाड़ को गुलाम बनाने को आमादा था और प्रताप के सिर सवार था आजाद रहने का जुनून

हल्दीघाटी युद्ध तिथि विशेष : पाथळ-पीथळ काव्य में है 16वीं सदी के मेवाड़ के संघर्षपूर्ण दौर की दास्तां

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अकबर मेवाड़ को गुलाम बनाने को आमादा था और प्रताप के सिर सवार था आजाद रहने का जुनून

अकबर मेवाड़ को गुलाम बनाने को आमादा था और प्रताप के सिर सवार था आजाद रहने का जुनून

जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. काव्यों में महाराणा प्रताप के सम्पूर्ण जीवन की कई मिसालें दी जाती रही हैं। ये उदाहरण स्वतंत्रता प्रेमी एवं राष्ट्रभक्तों को हमेशा प्रेरित करते हैं।
मेवाड़ की धरती क्षात्रधर्म की प्रतिष्ठा, मर्यादा एवं गौरव का प्रतीक तथा सम्बल है। यहां बप्पा रावल, हमीर, कुम्भा, राणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे शूरवीरों, कर्मठ राष्ट्रभक्त और आजादी के अग्रदूतों के महान त्याग एवं उदात शास्वत मूल्यों ने भारतीय इतिहास एवं संस्कृति को गौरवान्वित किया है। महान प्रेरक महाराणा प्रताप ने 16वीं सदी में एशिया के सबसे ताकतवर शासक अकबर के विरुद्ध मातृभूमि की स्वतंत्रता अक्षुण्ण बनाए रखने का सतत् संघर्ष किया, उसे यूनान के इतिहास में थरमोपल्ली एवं मैराथन के युद्ध की तुलना करने पर ही समझा जा सकता है। महान इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने इसी परिप्रेक्ष्य में हल्दीघाटी के युद्ध की तुलना थर्मोपल्ली एवं दिवेर के युद्ध की तुलना मैराथन से की। उसके बताया कि प्रताप ने अकबर के साम्राज्यवादी एवं मुगल औपनिवेशिक विस्तार के खिलाफ सनातन धर्म, सनातन संस्कृति एवं स्वदेश की आजादी के ऐसे मूल्यों की स्थापना की, जिनसे प्रेरित होकर गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, कन्नड़, बंग्ला, राजस्थानी, उर्दू एवं अन्य भाषा साहित्य में प्रताप के महान महान त्याग व चरित्र संबंधित काव्य रचनाओं इतिहासपरक ग्रंथों की रचना हुई है। कन्हैयालाल सेठिया की रचना भी इसी लेखन परम्परा का अंश है। पाथळ एवं पीथळ भी इसी प्रकार का प्रसिद्ध साहित्यिक काव्य है। सेठिया के ऐतिहासिक ग्रंथों में समकालीन परिस्थिति का जिस तरह चित्रण किया गया है, वह प्रताप के सम्पूर्ण संघर्षमय जीवन का ही नहीं, बल्कि 16वीं सदी में भारतीय राजा, महाराजा एवं प्रजा के संघर्षमयकाल का चित्रण है कि किस तरह चितौड़ एवं मेवाड़ का विस्तृत प्रदेश मुगल अधीनता में चला गया। कवि लिखते हैं कि 'हूं भूख मरू हूं प्यास मरू मेवाड़ धरा आजाद रहेÓ। एक पंक्ति में प्रताप के कुल गौरव के प्रतीक को इस तरह प्रतिबिंबित किया ... जब राणा रो संदेश गयो पिथळ री छाती दुणी ही हिंदवाणों सूरज चमको हो अकबर की दुनिया सुनी ही। दरअसरल, सेठिया ने पाथळ एवं पीथळ नामक काव्य अकबर एवं प्रताप के जीवन मूल्यों एवं लक्ष्यों को इंगित किया, जिनमें अकबर प्रताप को अपने अधीन करने के लिए कटिबद्ध था तो प्रताप मृत्युपरांत अपनी आन-बान, शान, मर्यादा, राजधर्म, क्षास्त्रधर्म की रक्षा के लिए मर-मिटने को आमादा थे। इसी दृष्टि से प्रताप अकबर से भी कहीं ज्यादा महान नजर आते हैं। इतिहासकार अजातशत्रु बताते हैं कि प्रताप सर्वकाल में प्रेरक रहेंगे।