उद्घाटन के साथ ही शुरू हो गया था बाघों की मौतों का सिलसिला, पांच साल में तीन बाघ मारे गए, अब पर्यटकों के लिए सिर्फ एक बाघ
जितेन्द्र पालीवाल @ उदयपुर. मेवाड़ के जंगल, झीलें और यहां की आबोहवा में कुछ वक्त बिताने को दुनियाभर के पर्यटक बेताब हैं, वहीं लगता है बाघों को यहां का माहौल रास नहीं आ रहा है। एक के बाद एक लगातार तीन बाघों की मौतें चिंता का सबब बन गया है। लेकसिटी में पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क लगातार बदनीसीबी से गुजर रहा है। पहले मोनू, फिर रामा और अब दामिनी की मौत ने यहां के वन्यजीव और पर्यटन को झटका दिया है। पर्यटक तो मायूस हैं ही, अभयारण्य का स्टॉफ भी फिक्रमंद हो गया है।
इस बायोलॉजिकल पार्क का औपचारिक उद्घाटन वर्ष 12 अप्रेल, 2015 को हुआ था। उसके बाद से अब तक यहां तीन टाइगर की मौत अप्राकृतिक कारणों से हो चुकी है। दो बाघों की बीमारी के चलते और एक बाघिन ने आपसी लड़ाई में जान गंवा दी। एक बाघ तो इस पार्क के उद्घाटन से दो दिन पहले ही मौत का शिकार हो गया था। अब फिलहाल यहां एकमात्र बाघ कुमार ही बचा है, जिसे पर्यटकों को देखने के लिए डिस्प्ले एरिया में छोड़ा जाता है। एक और बाघ उस्ताद (टी-24) भी यहां मौजूद है, लेकिन उसे सैलानियों के देखने के लिए नहीं छोड़ा जाता है। उसे बाड़े में नजरबंद ही रखा जाता है। उस्ताद को रणथम्भौर में इंसानों पर लगातार हमले कर उन्हें मौत के घाट उतारने के बाद वन विभाग ने यहां शिफ्ट किया था। उस्ताद अभी 16 साल का हो चुका है। आमतौर पर टाइगर औसतन 18 वर्ष की उम्र तक ही जीते हैं। दामिनी, उस्ताद और कुमार रॉयल बंगाल प्रजाति के टाइगर हैं।
यूं चला बाघों की मौत का सिलसिला
- 2 जनवरी, 2020 : नए साल की शुरुआत में बायोलॉजिकल पार्क के लिए फिर बुरी खबर आई। 15 साल की बाघिन दामिनी के एनक्लोजर की जाली तोड़कर उसमें घुसा और श्वसन नली दबाकर मार डाला। इस नजारे को वहां मौजूद दर्जनों पर्यटकों ने केवल देखा। वनकर्मी भी कुछ कर पाते, इससे पहले ही दामिनी का दम टूट गया।
- 27 सितम्बर, 2018 : उदयपुर में एकमात्र सफेद बाघ रामा की 45 दिनों तक लगातार बीमार रहने के बाद किडनी फेल्योर होने से पांच साल की उम्र में मौत हो गई थी। रामा बबेशिया नामक बीमारी से ग्रसित था। उसे किडनी रोग की भी पुष्टि हुई थी। रामा के लीवर और किडनी में संक्रमण के कारण उसकी हालत गंभीर थी।
- 11 अप्रेल, 2015 : बायोलॉजिकल पार्क में टाइगर मोनू की मौत हो गई थी। वो लेप्टो स्पाइरोसिस बीमारी से ग्रसित था, जिससे उसकी किडनी खराब हो गई और फेफड़ों में इन्फेक्शन हो गया था। उसी साल उसे 5 मार्च को बेनरघाटा से लाया गया था।
- 5 दिसंबर 2010 तक गुलाबबाग जू में केवल एक बाघिन राधा थी, जिसकी मौत के बाद उदयपुर में टाइगर का नामो-निशान नहीं बचा था। बायोलॉजिकल पार्क बनने के बाद यहां बाघों को लाने का सिलसिला फिर से शुरू हुआ। आजादी से पूर्व व रियासतकाल में मेवाड़ सैकड़ों की तादाद में टाइगर थे।
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एक बाघिन को फिर लाने की कोशिश करेंगे
दामिनी की मौत के बाद बाघों की कमी पूरी करने की कोशिश के तहत एक बाघिन को लाया जाएगा। अभी कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है, लेकिन जहां किसी चिडिय़ाघर या अभयारण्य में अतिरिक्त बाघ होंगे, वहां से शिफ्टिंग करवाकर उदयपुर के बायोलॉजिकल पार्क में लाएंगे। इसके लिए प्रक्रिया जल्द शुरू करेंगे। बाघिन यहां लाने में करीब दो से तीन माह का समय लग सकता है। कुछ और भी श्रेणी के वन्यजीव जैसे वुल्फ, जैकाल, ब्लैक बक भी जल्द लाए जाएंगे।
आर.के. सिंह, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव), उदयपुर