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गम गी पुरानी म‍िठायां, भूलिग्‍या मोहनथाल उं लेई न हरिरा तक रो स्‍वाद

होली के पारम्परिक व्यंजनों की अखरती है मिठास, अब घरों में नहीं बनती पहले जैसी पारंपरिक मिठाइयां

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उदयपुर. होली का त्योहार ऐसा है जो मिठास के बिना अधूरा है। भले ही वह रिश्तों की मिठास हो या मिठाइयों की मिठास। मिठाइयों की बात की जाए तो पुराने जमाने में होली के त्योहार पर कुछ विशिष्ठ मिठाइयां बनती थीं जो अब घरों में बनना बहुत कम हो गई हैं। ऐसे में आज की मिठाइयों से तो इन पारंपरिक मिठाइयों की मिठास गायब हो चुकी हैं पर, आज भी दिलों में उनकी मिठास कायम है।


अब बाजार की मिठाइयों से होता है मुंह मीठा

पुराने शहर में रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं के अनुसार, होली के त्योहार पर पहले मोहन थाल , मूंग दाल चक्कियां, बेसन बर्फी, हरिरा आदि व्यंजन बनाए जाते थे, लेकिन आजकल उन्हें लोग भूल चुके हंै। । हरिरा तो अब बहुत कम देखने को मिलता है। इसके अलावा दाल का हलवा, बर्फी, लपसी, गुझिया भी मुख्य रूप से बनते थे, वह भी अब कोई नहीं बनाता है। अब लोग इन व्यंजनों को भूल चुके हैं और अधिकतर सब बाजारों से मिठाइयां खरीद कर ले आते हैं।