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उदयपुर की इन आदिवासी बेटियों की ख्वाहिश आसमां छूने की …बस सपनों पर पंख लगने की देर

- आदिवासी बालाएं कर रही है नए जमाने के साथ कदमताल , कभी नहीं पढऩे वाली बालिकाएं आज चिकित्सक व अधिकारी बनने की इच्छुक

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उदयपुर की इन आदिवासी बेटियों की ख्वाहिश आसमां छूने की ...बस सपनों पर पंख लगने की देर

सिकंदर पारीक / राकेश शर्मा राजदीप . उदयपुर. आज मैं ऊपर, आसमां नीचे...आज मैं आगे, जमाना है पीछे...। कुछ इसी अंदाज में उदयपुर संभाग की आदिवासी बालाएं इन दिनों यहां हौसलों की उड़ान से सफलता की नई इबारत लिखने में जुटी हैं। कभी जो अपने गांव-ढाणी से बाहर नहीं निकली, वे यहां शहर में उच्च शिक्षा की तरफ पांव बढ़ा रही हैं। गांव की तंग गलियों और घुटन भरे कुरीतियों के माहौल से निकलकर लेकसिटी में जमाने के साथ ही कदमताल कर रही है। इनके पास आज बड़ा लक्ष्य, बड़ी सोच है। इनकी ख्वाहिश है कि अपने सपनों पर मेहनत के पंख लगाकर खूब उड़े। स्वयं आत्मनिर्भरता के साथ ही अपने भाई-बहनों को भी अच्छी शिक्षा दिलाने का भी इन्होंने संकल्प कर रखा है। यहां जनजाति बालिकाओं के बहुउद्देश्य छात्रावास में जहां 85 बालिकाएं प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए प्रशासनिक सेवा, चिकित्सक, शिक्षक बनने के लक्ष्य को पाने में जुटी है तो ढीकली स्थिति आवासीय विद्यालय में राज्यभर की 350 बालिकाएं उच्च शिक्षा के लिए गांवों से शहर में पढऩे के लिए आई हैं।

लक्ष्य पूछा तो टपके आंसू

इन बालिकाओं में से अधिकांश के माता-पिता निरक्षर हैं। किसी के घर में तो दो वक्त की रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल से होता है। किसी के नौ भाई-बहन हैं तो किसी के भाई-बहन मानसिक रोग से पीडि़त। बावजूद इसके उच्च शिक्षा की डगर पर बच्चियां निकली हैं। इनसे लक्ष्य और तैयारी पूछी तो एकबारगी टप-टप आंसू गिरे। फिर बोलीं- स्थिति तो पढऩे की है नहीं, लेकिन हमारी इच्छा और माता-पिता की सकारात्मक सोच ने हमें नया मुकाम दिया।

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अभावों से दृढ़ हुए संकल्प, अनुशासन से राह सरल

- चीखली- डुंगरपुर की सोनू मीणा के पिता खेती करते हैं। वो बताती है ‘सत्ता और राजनीति के गलियारे भले ही विकास की कहानी बयां करें लेकिन, आजादी के सत्तर बरस बाद भी गांव-ढाणियों में हालात बहुत अनुकूल नहीं हुए हैं। मैं अपने दम पर प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज सुधार की नई इबारत गढऩा चाहती हूं।’
- ‘गांवों में चिकित्सा सुविधाओं की हालत बहुत बुरी है। कोई भी सेवाभाव लिए ईमानदारी से गरीबों की सुध नहीं लेता। मैं डॉक्टर बनने के बाद गांव में ही रहकर अपने किसान पिता के सपनों को साकार जरूर करूंगी।’ बताती हैं देवल-डुंगरपुर की सोनल, जो यहां पीएमटी की तैयारी में जुटी हैं।