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धनतेरस पर आदिवासी धन-दौलत नहीं, गोवंश की करते हैं पूजा

DHANTERAS's RITUAL : प्राचीन काल से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है यह परंपरा

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धनतेरस पर आदिवासी धन-दौलत नहीं, गोवंश की करते हैं पूजा

नदी पर गाय को स्नान कराते हुए।

कोटड़ा (निसं) . आदिवासी समाज धनतेरस पर पैसा या सोने की पूजा नहीं करते है बल्कि गोवंश को ही धन की देवी लक्ष्मी मानकर उसकी पूजा करते हैं। इसके चलते आदिवासी बहुल कोटड़ा क्षेत्र में शुक्रवार को ग्रामीणों ने धनतेरस पर्व पर गायों की पूजा की।
आदिवासी समाज ने परम्परानुसार धनतेरस पर घरेलू मवेशियों विशेष रूप से गाय-बैल को नदी-तालाब पर ले जाकर स् नान करवाया गया। बाद में अन्य पालतू पशुओं का स्नान करवाने के बाद गायों को रोटी या गुड़ खिलाया गया। यह परंपरा प्राचीन काल से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। धनतेरस के दिन गाय किसी दूसरे के खेत पर फसल या कुछ और खा भी जाती है तो लोग बुरा नहीं मानते है। साथ ही दिवाली के दूसरे दिन बाड़े में ही मीठी प्रसादी और नारियल चढ़ाकर गायों की पूजा करने के बाद उन्हें रंग-बिरंगे कलर से सजाया जाता है। सींग पर सुनहरे कलर एवं सिर पर मोर पंख से सजावट की जाती है। गले में घुंघरू एवं घंटी बांधी जाती है।
खोदा एक प्रकार का नाटक है ,जो कोटड़ा के आदिवासी क्षेत्र में आज भी दिवाली से आठ-दस दिन पहले गांव एवं आसपास के (फला) में हर घर पर खेला जाता है जिसमें दस से पंद्रह महिलाएं एवं पुरुष रात को नेग मांगने निकलते हैं। खोदा की भूमिका पुरुष एवं महिला दोनों में से कोई एक पात्र बनता है। जो फटे-पुराने कपड़ा मुंह पर बांधकर एक लकड़ी लेकर नाचता हुआ हर घर के दरवाजे पर लकड़ी को जोर जोर से ठोकता-पीटता है। गीत गाते हुए मौसम के अनुसार कद्दू, चवला, मक्का या पैसा मांगता है। सामग्री एकत्रित करने के बाद उसकी घूघरी बनाई जाती है, जिसे बाद में सभी सदस्यों या बच्चों में बांट दिया जाता है।