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भाई कंधों पर बैठाकर ले जाते थे नेताराम को स्कूल, पिता ने जमीन गिरवी रख भरी फीस, आखिर मिली कामयाबी

Success Story : आदिवासी बहुल कोटड़ा क्षेत्र में अभावों में जिंदगी बसर कर रहे एक परिवार में चार भाई। एक को छोड़कर सभी नि:शुक्त जन। इनमें भी दो तो हाथों के बल चलते हैं। लेकिन उनका हौसला पहाड़ सा मजबूत है।

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Udaipur Disabled Netram Garasiya success story

कपिल सोनी/गोगुंदा (उदयपुर)। आदिवासी बहुल कोटड़ा क्षेत्र में अभावों में जिंदगी बसर कर रहे एक परिवार में चार भाई। एक को छोड़कर सभी नि:शुक्त जन। इनमें भी दो तो हाथों के बल चलते हैं। लेकिन उनका हौसला पहाड़ सा मजबूत है। एक निशक्त भाई ने जब सरकारी नौकरी हासिल की तो पूरे परिवार की आंखें भर आई और माता- पिता गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं।

यहां जिक्र किया जा रहा है रणेश गांव में नि:शक्तजन नेताराम गरासिया का, जिन्हें राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रावलिया कलां में अध्यापक लेवल-2 (गणित-विज्ञान) के पद पर नियुक्ति मिली। रणेश गांव निवासी नूराराम के चार बेटे हैं। इनमें से सबसे बड़े करनाराम को छोड़कर बाकी तीन नेताराम, हुसाराम व भैराराम नि:शक्त है। करनाराम पिता के साथ खेती तो भैराराम शहर में चौकीदारी कर पेट पाल रहा है। नेताराम ने अभावों के बावजूद उच्च शिक्षा हासिल कर नौकरी पाई

निशक्तता रोक नहीं पाई उच्च शिक्षा की राह
नेताराम को 9वीं -10वीं कक्षा की शिक्षा में सड़क के नजदीक रह रहे भूरीलाल ने मदद का हाथ बढ़ाया और अपने घर में ही रहने की पूरी व्यवस्था की। जहां भोजन का इंतजाम किया। बिजली नहीं होने से रात में चिमनी के सहारे पढाई जारी रखी। समय के साथ दानदाताओं ने ट्राइसाइकिल देकर मदद का हाथ बढ़ाया। वर्ष 2016 में दसवीं कक्षा 70% अंकों के साथ उत्तीर्ण की। अधिवक्ता हुसाराम गरासिया ने सहयोग कर उदयपुर के राजकीय फतह स्कूल में प्रवेश दिलाया और विद्यालय के निकट समाज कल्याण छात्रावास में रहने की व्यवस्था करवाई। पास में शू मेकर नानालाल ने घुटनों में पहनने के लिए शूज बनाकर देने में सहयोग किया।

पिता ने जमीन गिरवी रख की फीस की व्यवस्था
नेताराम मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय में बीएससीबीएड. में प्रवेश लिया। हमारे पास कॉलेज फीस की उचित व्यवस्था नहीं थी। इसके लिए पिता ने आधी जमीन गिरवी रखकर फीस की व्यवस्था की। कुछ समय बाद दिव्यांग स्कूटी योजना के तहत एक स्कूटी प्राप्त हुई। फिर कॉलेज की नियमित पढ़ाई के साथ-साथ प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी भी जारी रखी और डिग्री ली और अध्यापक भर्ती परीक्षा-2022 की तैयारी में पूरी तरह जुट गए।

आरंभ में आई मुश्किलें, लेकिन मिला सहयोग
आगे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी भी बाहर रखकर कराने में आर्थिक परेशानी बनी रही। आरंभ में बहुत मुश्किलें आ रही थी पर पेशे से शिक्षक और अधिवक्ता राजेन्द्र समीजा ने नौकरी लगने तक के खर्चे की जिम्मेदारी ली। हर माह आर्थिक रूप से मदद करते। परिवार के सभी सदस्यों की भी मदद करते हैं।

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