20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

राजस्थान की 16 वस्तुओं को जीआई टैग, उदयपुर के नाम एक भी नहीं…जानिए क्यों..

जीआई टैग किसी भी क्षेत्र की विशिष्ट पहचान वाली वस्तु को मिलता है जो सालों से उस क्षेत्र की खासियत होती है, संभाग के राजसमंद की मोलेला कला और प्रतापगढ़ की थेवा कला को मिल चुका है जीआई टैग

3 min read
Google source verification
gi_tag.jpg

कश्मीर का केसर और पश्मीना शॉल, नागपुर के संतरे, बंगाली रसगुल्ले, यूपी की बनारसी साड़ी, राजस्थान के बीकानेरी भुजिया, जयपुर की ब्लू पॉटरी.. ये नाम तो आपने सुने ही होंगे। ये सभी इन राज्यों की विशेषता है तो वहां की पहचान भी है। खास बात यह है कि इन सभी को जीआई टैग मिला हुआ है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उदयपुर की किस चीज को या जगह को जीआई टैग मिला है.. तो आपको बता दें कि उदयपुर की एक भी चीज को अब तक जीआई टैग नहीं मिला है। वहीं, संभाग की बात करें तो राजसमंद के मोलेला गांव की टैराकोटा मिट्टी कला व प्रतापगढ़ की थेवा कला को जरूर जीआई टैग मिल चुका है।

ये है जीआई टैग

जीआई टैग ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी भौगोलिक संकेत का संक्षिप्त नाम है। जीआई टैग मुख्य रूप से कृषि, प्राकृतिक उत्पाद या एक निर्मित उत्पाद हस्तशिल्प और औद्योेगिक सामान जो एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में उत्पन्न होता है। यह उस उत्पाद को दिया जाता है जो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में 10 वर्ष या उससे अधिक समय से निर्मित या उत्पादित किया जा रहा है। ये 10 साल के लिए मिलता है।

अब तक राजस्थान की इन चीजों को मिला है जीआई टैग -

हस्तशिल्प -

बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग (हस्तशिल्प)

जयपुर की ब्लू पॉटरी (हस्तशिल्प)

जयपुर की ब्लू पॉटरी (लोगो)

राजस्थान की कठपुतली (हस्तशिल्प)

राजस्थान की कठपुतली (लोगो)कोटा डोरिया (हस्तशिल्प)

कोटा डोरिया (लोगो) (हस्तशिल्प)

मोलेला मिट्टी का काम (हस्तशिल्प)

राजस्थान का मोलेला मिट्टी का काम (लोगो) (हस्तशिल्प)

फुलकारी (हस्तशिल्प)

पोकरण मिट्टी के बर्तन (हस्तशिल्प)

सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग (हस्तशिल्प)

थेवा आर्ट वर्क (हस्तशिल्प)

खाद्य सामग्री

बीकानेरी भुजिया (खाद्य सामग्री)

प्राकृतिक सामान

मकराना मार्बल (प्राकृतिक सामान)

सोजत मेहंदी

उदयपुर की इन चीजों को मिलना चाहिए --

गवरी नृत्य - आदिवासी संस्कृति को पेश करने वाला और सालों से चली आ रही एक जीवंत परंपरा है।

- लकड़ी के खिलौने - सालाें से उदयपुर लकड़ी के खिलौनों के लिए जाना जाता रहा है। हालांकि अब इनका उत्पादन कम हो चुका है। लेकिन अब भी कई परिवार ऐसे हैं जो इस कला को जिंदा बनाए हुए हैं।

- मिनिएचर आर्ट - मेवाड़ को स्कूल ऑफ आर्ट के नाम से जाना जाता है। कलाओं की शुरुआत यहीं से हुई। मिनिएचर आर्ट यहां का बहुत प्रसिद्ध है।

- जल सांझी - जल सांझी एक ऐसी कला है जिसमें पानी पर चित्र उकेरे जाते हैं । ये कला भगवान कृष्ण को समर्पित है।

विशेषज्ञों का कहना ...

लकड़ी के खिलौने पहले उदयपुर की पहचान होते थे, लेकिन अब इनका उत्पादन सीमित ही रह गया है। कुछ परिवार आज भी इससे जुड़े हैं। आज भी ये उदयपुर की विशेषता तो है। वहीं, शहर की प्राचीन कलाएं जैसे गवरी नाट्य, मिनिएचर आर्ट, जल सांझी आदि को जीआई टैग मिलना चाहिए। इसके लिए प्रयास भी करने चाहिए। उदयपुर की जो विशेष चीजें हैं उसे जीआई टैग दिलाने को आवेदन करना चाहिए।

- डॉ. सतीश शर्मा, पर्यावरण विशेषज्ञ

जीआई टैग एक तरह से वैश्विक पहचान का प्रतीक है। इसका स्तर और व्यापक होना चाहिए। वस्तुओं के अलावा धरोहर वाले स्थानों को भी इस सूची में रखना चाहिए। जैसे सास बहु का मंदिर, अंबिका मंदिर, सिटी पैलेस, चावंड, बेणेश्वर आदि को भी शामिल किया जाना चाहिए।

- डॉ अजातशत्रु सिंह शिवरती, इतिहासकार

जीआई टैग उस क्षेत्र की किसी विशेष पहचान रखने वाले उत्पाद को मिलता है जो सालों से वहां हो और उसके अलावा कहीं नहीं होता हो। इस संबंध में उदयपुर को देखें तो यहां खाने-पीने की विशेषता रखने वाले ऐसी कोई वस्तु या उत्पाद नहीं है जो केवल उदयपुर की विशेषता हो। यहां राजस्थान में मिलने वाला हर खान-पान ही चलता है। इसलिए अभी खाने के मामले में उदयपुर जीआई टैग से वंचित है।

- डॉ. पीयूष भादविया, आहार विशेषज्ञ व सहायक आचार्य, इतिहास विभाग, सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर