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महिलाओं ने शीतला सप्तमी पर मां की पूजा कर मांगी सुख-समृद्धि

शहरभर में परम्परागत उल्लास से मनाया गया पर्व

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शीतला सप्तमी

शीतला सप्तमी

उदयपुर. सप्तमी पर मंगलवार को मां शीतला की पूजा-अर्चना के साथ ही उनसे सुख समृद्धि की कामना की गई। इस दिन घरों में एक दिन पूर्व बने व्यंजनों को ही खाया गया। मेवाड़ में अष्टमी पर शीतला माता की पूजा करने की भी परंपरा है। ऐसे में कई घरों में सप्तमी की शाम को भोजन बनाया गया। अष्टमी पर माताजी की पूजा कर उन्हें भोग लगाकर प्रसाद के रूप में इसे ही ग्रहण किया जाएगा।

लोक परम्पराओं के अनुसार होली के बाद मेवाड़ में सप्तमी और अष्ठमी पर शीतला माता की पूजा की जाती है। सप्तमी पर पूजा करने वाली महिलाओं ने छठ की शाम को भोजन तैयार किया। इसमें चावल, केर सांगरी की सब्जी, आलू, भिंडी, बैंगन की सब्जी, पूड़ी, अमचूर आदि तैयार किए गए। मंगलवार सुबह चावल का खट्टा और मीठा ओलिया तैयार किया गया। इसके साथ ही शीतला माता की पूजा की गई। पूजा के दौरान आटे में हल्दी मिलाकर दीपक, गहने आदि तैयार किए गए। माताजी को स्नान करवाकर दीपक में बाती रखकर माताजी को बिना जलाए अर्पित की गई। वहीं गहने और अगरबत्ती भी बिना जलाए अर्पित किए गए। एक दिन पूर्व बनाए गए व्यंजन और ओलिया का माताजी को भोग लगाया गया। पूरे दिन इन्हीं व्यंजनों को खाया गया।
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पंचकुटा में पौष्टिकता और औषण गुण
सप्तमी और अष्टमी पर पंचकुटा या केर सांगरी की सब्जी बनाई जाती है। यह सब्जी पौष्टिकता और औषधिय गुणों से भरपूर है। एमएलएसयू के वनस्पति शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. जीएस देवड़ा ने बताया कि इस विशेष प्रकार की सब्जी में कैर, सांगरी, कुमटिया, गुंदा व देसी बबूल की फलियां शामिल होती है। पहले यह सब्जी रेगिस्तानी क्षेत्रों में ही बनाई जाती थी। वर्तमान में पूरी भारत यहां तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसे बनाया जाने लगा है। कैर के कच्चे फलों को सूखाकर उपयोग किया जाता है। इसमें कैल्शियम, आयरन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, विटामिन ए प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। यह जोड़ों के दर्द, गठिया, दमा, खांसी, डायबीटिज, कब्ज आदि में उपयोगी है।