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पिछोला झील में क्रूज का पर्यावरण एक्‍सपर्ट ने किया विरोध

जल व जीवों का जीवन चक्र बिगाड़ देगा क्रूज

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पिछोला झील में क्रूज का पर्यावरण एक्‍सपर्ट ने किया विरोध

पिछोला झील में क्रूज का पर्यावरण एक्‍सपर्ट ने किया विरोध

मुकेश हिंगड़ / उदयपुर. पिछोला झील में क्रूज चलाने की तैयारियां की जा रही है लेकिन शहर के पर्यावरण एक्‍सपर्ट ने उसके संचालन को लेकर विरोध किया है। उनका कहना था कि एक तो उदयपुर की झीलें छोटी है और ऊपर से इन झीलों से ही शहर की प्यास बुझाई जाती है ऐसे में इस पानी को खराब करने का काम किसी भी सूरत में नहीं होना चाहिए। जोर दिया गया कि जीव-जन्तुओं का पारिस्थितिकी तंत्र भी बर्बाद कर दिया जाएगा। नगर निगम पिछोला झील में 150 सीटर क्रूज को पर्यटकों को सवारी कराने के लिए उतारने की तैयारी कर रहा है। छोटे जहाजनुमा इस क्रूज को लेकर पर्यावरण, पक्षियों व झीलों से जुड़े लोगों ने ठीक नहीं माना। यह क्रूज करीब 38 मीटर लंबा, 12 मीटर चौड़ा और 13 मीटर ऊंचा तीन मंजिला होगा।


क्या बोले पर्यावरणविद्

हमारी झीलें शहर की प्यास बुझाने की बड़ी स्रोत है। इनमें वाटर स्पोट्र्स एवं क्रूज का संचालन नहीं होना चाहिए। वैसे भी हमारी झीलें छोटी है और पीने का पानी भी यहीं से सप्लाई होता है। ऐसे में पानी को प्रदूषित नहीं किया जा सकता है। झीलों में पक्षियों से लेकर जीव जंतुओं का पारिस्थितिकी तंत्र भी है जो प्रभावित होगा ही। कुल मिलाकर झीलों को इससे मुक्त रखते हुए प्रदूषण से बचाना जरूरी है।
- डॉ. अनिल मेहता, झील संरक्षण समिति


जिसका जो पारिस्थितिकी तंत्र है उसे नहीं छेडऩा चाहिए। पक्षियों व जीव जंतुओं की दुनियों को छेडऩे का काम हुआ तो उनका आवास पूरी तरह से बिखर जाएगा। उनकी भी अलग दुनिया है। जल व उसमें जीने वाले जीवों के जीवन चक्र में भी बाधा आती है। प्रदूषित पानी में वे रहेंगे तो उनका जीवन व आवास खराब होगा। क्रूज की भौतिक गति से तंत्र खराब होगा तो यांत्रिक रूप से ईंधन से भी झील प्रदूषित होगी। जल के जीवन चक्र में भी बाधा आएगी, ऐसे में क्रूज नहीं चलना चाहिए।
- आर.एम. लोढ़ा, पर्यावरणविद्

हमारी झीलों में जलीय जीव, वनस्पति है जो पहले से प्रभावित हो रही है। झीलों का आकार बड़ा नहीं है, उनका आकार देखकर उसमें ज्यादा गतिविधियां करते है तो प्रभावित तो होती है इसमें कोई दो राय नहीं है। वैसे कोई भी ऐसी चीज करने से पहले विशेषज्ञों का एक पैनल बनाना चाहिए, इसमें झील, पक्षियों, पर्यावरण, सरकारी विभाग के प्रतिनिधियों को उसमें शामिल किया जाए। उसमें पूरी ईमानदारी के साथ चिंतन करना चाहिए। पानी पर निर्भर रहने वाली हमारी संपदा भी बचे, जैसे हमारे हित है वैसे उनके भी हित है। किसी का हित बाधित नहीं हो और पूरी चर्चा के बाद निर्णय करना चाहिए।
- डॉ. सतीश कुमार शर्मा, सेवानिवृत सहायक वन संरक्षक