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रावली की ढलानों पर उगा ‘सफेद सोना’, 35 किसानों की बदली तकदीर

उदयपुर

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Newsdesk

Jul 24, 2026

Rajasthan

काछबली में औषधीय खेती का अनूठा मॉडल, हर्बल गार्डन में 100 से ज्यादा पौधे और 200 प्रजातियों के बीज सुरक्षित
Bहीरालाल भाट. भीम (राजसमंद) B
अरावली पर्वतमाला की पहाड़ी ढलानों के बीच बसे काछबली गांव में सफेद मूसली की खेती ने छोटे जोत वाले किसानों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई राह खोल दी है। 30 से 35 किसान औषधीय गुणों से भरपूर जैविक सफेद मूसली की खेती कर रहे हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में कुल 4 टन से अधिक मूसली की पैदावार हो रही है। इसके साथ मिर्च और धनिया की मिश्रित खेती से किसानों ने आय के नए रास्ते भी तलाशे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि काछबली गांव और आसपास के क्षेत्र पहाड़ी ढाल वाली भूमि पर बसे हैं, जिससे जोतों का आकार छोटा है। स्थानीय जलवायु सफेद मूसली की खेती के लिए अनुकूल है और यह किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बन सकती है। इसके लिए सरकारी सहयोग और प्रोत्साहन जरूरी है। सफेद मूसली मंडियों में 1500 से 3 हजार रुपए प्रति किलो की दर से बिकती है। स्थानीय किसान इसे इंदौर और दिल्ली की मंडी में ले जाकर बेचते हैं।


28 साल पहले शुरू हुआ प्रयोग, अब बन गया मॉडल

कभी गेहूं और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले प्रगतिशील किसान हजारी सिंह ने करीब 28 साल पहले औषधीय पौधों की खेती शुरू की। शुरुआत में ग्रामीणों ने इसे आश्चर्य और जिज्ञासा से देखा, लेकिन आज यह प्रयोग पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुका है। उनकी खेती से सालाना 4 से 5 लाख रुपए की आय हो रही है। उनकी पहल से गांव के अन्य किसानों ने भी सफेद मूसली की खेती अपनाई। वर्तमान में किसान प्रति किसान 1 से 2 क्विंटल तक मूसली का उत्पादन कर रहे हैं। इस खेती से महिलाओं को रोजगार, बच्चों की शिक्षा के लिए बेहतर अवसर और युवाओं को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा मिली है।



हर्बल गार्डन बना जीवित पुस्तकालय

हजारी सिंह ने अपने आंगन में 100 से अधिक औषधीय पौधों का हर्बल गार्डन तैयार किया है। प्रत्येक पौधे के साथ उसका परिचय और औषधीय उपयोग भी लिखा गया है। इसके अलावा उन्होंने करीब 200 प्रकार के औषधीय पौधों के बीज भी सुरक्षित रखे हैं। यह प्रयास परंपरागत ज्ञान और जैव विविधता को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।



सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के शोधार्थी अनिश चौधरी के अनुसार काछबली और गोरमघाट जैसे क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खेती आर्थिक समृद्धि के साथ ज्ञान संरक्षण, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का उदाहरण है। ऐसे मॉडलों को बढ़ावा मिलने पर किसानों की आर्थिक िस्थति सुधरेगी।

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गिरदावरी में कॉलम नहीं, दो साल से अटकी समस्या

सफेद मूसली उत्पादक किसानों की प्रमुख समस्या अब तक हल नहीं हुई है। किसानों का कहना है कि पिछले दो वर्षों से पटवारी द्वारा सफेद मूसली की गिरदावरी नहीं की जा रही है। पूछने पर बताया जाता है कि गिरदावरी एप में औषधीय फसल जैविक सफेद मूसली का कॉलम उपलब्ध नहीं है। किसानों की मांग है कि सफेद मूसली की फसल का गिरदावरी रिकॉर्ड दर्ज करने की व्यवस्था की जाए। किसानों का कहना है कि सरकारी सहयोग, प्रशिक्षण, लघु प्रसंस्करण इकाइयां और उचित बाजार उपलब्ध होने पर यह क्षेत्र देशभर में औषधीय खेती के लिए पहचान बना सकता है।