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World Suicide Prevention Day 2023: 60 प्रतिशत टीनएजर्स मूड डिसऑर्डर के कारण करते हैं आत्महत्या

World Suicide Prevention Day 2023: क्या आप जानते हैं कि लगभग 1 लाख लोग साल भर में आत्महत्या कर लेते हैं। आत्महत्या के मामलों में 80 से 90 प्रतिशत मानसिक बीमारियां इसका कारण होती हैं।

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क/उदयपुर। World Suicide Prevention Day 2023: क्या आप जानते हैं कि लगभग 1 लाख लोग साल भर में आत्महत्या कर लेते हैं। आत्महत्या के मामलों में 80 से 90 प्रतिशत मानसिक बीमारियां इसका कारण होती हैं। वहीं, लगभग 60 प्रतिशत किशोरों में मूड डिसऑर्डर (खास तौर पर डिप्रेशन) आत्महत्या का मुख्य कारण होता है। ये पढ़कर आपको भी अच्छा नहीं लगेगा, लेकिन ये आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं, जो सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

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लड़कों में आत्महत्या के मामले दोगुने : नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 13.6 प्रतिशत नौजवानों में आत्महत्या के विचार आते हैं एवं 8 प्रतिशत आत्महत्या की कोशिश करते हैं। लगभग 30 प्रतिशत आत्महत्या के विचार साल भर में प्लान में बदल जाते हैं और लगभग 60 प्रतिशत प्लान आत्महत्या की कोशिश में बदल जाते हैं। 15 से 30 प्रतिशत किशोर साल भर में दोबारा कोशिश करते हैं और सबसे ज्यादा संभावना शुरू के 3 महीने में रहती है।आत्महत्या करने के दौरान बच जाने से अगर किशोर को आत्मग्लानि होती है तो अगली बार आत्महत्या करने की कोशिश और जानलेवा तरीके से हो सकती है। 10 से 14 साल की उम्र में लड़कों में लड़कियों के मुकाबले आत्महत्या लगभग दोगुना होती है, वही 15 से 19 साल में लगभग तीन गुना हो जाती है।

ये जानना भी जरूरी, हम कर सकते हैं अपनों की मदद
● अगर कोई बच्चा मौखिक एवं व्यावहारिक संकेत देता है तो उससे उसकी आंतरिक समस्याओं के बारे में खुलकर बातचीत करनी चाहिए।
● इलाज में दवाइयों के साथ-साथ कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी, इंटरपर्सनल थेरेपी एवं फैमिली थेरेपी की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।
● आलोचना भरे शब्दों का प्रयोग नहीं करें।
● विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में लाइफ स्किल एजुकेशन को सम्मिलित करने से, जिसमें किशोरों को जिंदगी में आने वाली चुनौतियों को प्रभावशाली तरीके से सामना करना सिखाया जाता है।

टॉपिक एक्सपर्ट:
मनोचिकित्सक डॉ. आरके शर्मा के अनुसार, मूड डिसऑर्डर के अलावा किशोरों में जीवन के मूल्यों की कमी, कम उम्र में नशे का सेवन, पारिवारिक तनाव, बच्चे और माता-पिता में तनाव भरे रिश्ते, बच्चों के प्रति अत्यधिक आलोचना पूर्ण व्यवहार, माता-पिता में नशे की आदत एवं मानसिक बीमारियां भी आत्महत्या के अहम कारक हैं। कुछ किशोरों में अत्यधिक आवेगशीलता, पर्सनेलिटी में बदलाव भी आत्महत्या की कोशिश को बढ़ा देता है और कई बार आत्महत्या को अंजाम भी मिल जाता है। बढ़ता सामाजिक तनाव, जिसमें बच्चों से अत्यधिक अपेक्षा, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंता, नौकरियों में कमी किशोरों में चिंता एवं अवसाद की स्थिति को बढ़ा देती है, जिससे वे कई बार परिस्थितियों से दूर भागने लग जाते हैं, जो समय के साथ एक नकारात्मकता पैदा कर देता है और आत्महत्या के विचार भी आने लग जाते हैं। किशोरों में रोमांटिक रिलेशनशिप आम बात है और अनेक बार रोमांटिक रिलेशनशिप में असफलता भी किशोरों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में तब्दील हो जाती है।

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आत्महत्या के बचाव के प्रभावी तरीके: डॉ. शर्मा के अनुसार, आत्महत्या की रोकथाम में पहला कदम है इन विचारों की सामयिक पहचान करना एवं कारगर तरीकों से इसके बचाव के लिए सहयोग करना। किशोर अगर आत्महत्या के विचार प्रकट कर रहा है तो उसके पीछे के कारणों को समझना एवं गहराई को पहचानना इनकी मदद में पहला कदम है। इनको नजरअंदाज करने से किशोर आगे इनके बारे में बात करने से कतराते हैं एवं जो महज एक विचार ही होगा, आगे प्लान व उसके बाद कोशिश में बदल सकता है। जानकारी के अभाव में लगभग 80 प्रतिशत बच्चों को सामयिक सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती है।

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