
People drop by drop in Khandwa
उदयपुर. जल संरक्षण को लेकर आज पूरा विश्व चिंतित है। इसके तरीके खोजे जा रहे हैं लेकिन मेवाड़ ने जल को सहेजने का काम दुनिया में सबसे पहले करना शुरू कर दिया था। यही नहीं नदियों और झीलों को जोडऩे का काम भी आज से 118 वर्ष पहले ही कर लिया था। उदयपुर की झीलों के साथ यहां की बावडिय़ां भी अपने आप में ऐतिहासिक हैं और ये जल का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ऐसे में अब ये आवश्यक है कि जो दूरदर्शी सोच मेवाड़ के शासकों की थी और जिसका फायदा आज तक मिल रहा है, उसके लिए वर्तमान पीढ़ी को भी सीख लेनी चाहिए। साथ ही जल को संरक्षित करने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
उदयपुर के जलाशय जल संरक्षण एवं प्रबंधन के श्रेष्ठ उदाहरण
भूगोलवेता व गुरूनानक कॉलेज के प्राचार्य प्रो. नरपतसिंह राठौड़ के अनुसार विश्व में पहली बार नदियों को आपस में जोडऩे की शुरुआत उदयपुर बेसिन में तत्कालीन महाराणा फतह सिंह ने 13 अगस्त, वर्ष 1890 में की। उदयपुर शहर के पश्चिमोत्तर में 6 किलोमीटर दूरी पर स्थित चिकलवास गांव के समीप आहड़ नदी पर एक बांध बनाकर वर्षा ऋ तु में प्रवाहित अतिरिक्त जल को फतहसागर में पहुंचाने के लिए चिकलवास नहर का निर्माण किया। इस नहर निर्माण से फ तह सागर में आहड़ नदी का पानी 118 वर्ष पहले पहुंचा दिया, जबकि उस वक्त कहीं पर भी ऐसा कार्य नहीं हुआ था। वहीं, पहली बार राणा राज सिंह ‘प्रथम’ ने नदी बहाव को कृत्रिम रूप से मोड़ कर उसे स्थायित्व प्रदान किया। मेवाड़ के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल उबेश्वर क्षेत्र से निकलने वाली उबेश्वर नदी को मोडकऱ मोरवानी नदी में मिला दिया। इस प्रकार यह जल जनासागर तथा फ तह सागर में पहुंचा। उदयपुर शहर में गोवर्धन सागर, दूध तलाई, पिछोला झील, अमर कुण्ड, कुम्हारिया तालाब, रंगसागर, स्वरूप सागर तथा फतहसागर जलाशयों का निर्माण जल प्रबन्धन की दृष्टि से विश्व भर में श्रेष्ठ उदाहरण हैं। यद्यपि इन सभी जलाशयों की गहराई अलग होने के साथ-साथ समुद्रतल से ऊं चाई भी अलग-अलग है। वर्षा ऋ तु में जब ये जलाशय पानी से भर जाते हैं तो इन सभी जलाशयों का जल स्तर एक समान हो जाता है एवं पानी आपस में मिल जाता है। इस प्रकार के जलाशय विश्व भर में एकमात्र उदयपुर में ही विकसित किए गए।
बावडिय़ां भी हैं देती हैं जल संरक्षण का संदेश
इतिहासकार डॉ.श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार मेवाड़ ने हमेशा से ही पानी को संरक्षित किया। ये प्रयास महाराणा प्रताप के समय से हुए। मेवाड़ में बेवरी से लेकर बावड़ी तक डाबर से लेकर सरोवर तक मिल जाते हैं। मेवाड़ में कई तरह की बावडिय़ां हैं जिनमें एक मुखी, दो मुखी, त्रिमुखी, चौमुखी बावड़ी मिलती हैं। ये बावडिय़ां जल संरक्षण का संदेश देती हैं। उदयपुर की सबसे सुंदर व कलात्मक बावड़ी है सुंदरवास स्थित सुंदर बाई की बावड़ी। कभी यहां रेहट चला करता था और पांव से चलाने वाली पांवटी भी थी लेकिन अब यहां रेहट नहीं है। लेकिन, यहां रेहट वापस कारीगरों से बनवाकर इस बावड़ी को पर्यटन स्थल की तरह विकसित किया जा सकता है। जो पर्यटक रेहट देखना चाहते हैं, वे यहां आएंगे। अधिकतर बावडिय़ां रानियों, धायों और वारातण ने बनवाई।
उदयपुर को मिला है नेशनल वॉटर इनोवेशन अवॉर्ड
जलशक्ति मंत्रालय एवं इलेट्स टेक्नोमीडिया की ओर से पिछले साल ही नेशनल वाटर इनोवेशन समिट एंड अवाड्र्स कार्यक्रम में उदयपुर जिले को उत्कृष्ट वर्षा जल संग्रहण के लिए नेशनल वॉटर इनोवेशन अवॉर्ड से नवाजा गया। इस कार्यक्रम में भारत सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण, पेयजल और स्वच्छता, जनशक्ति मंत्रालय के सचिव उपेंद्र सिंह ने यह पुरस्कार तत्कालीन जिला परिषद सीइओ (नगर निगम आयुक्त) कमर उल जमान चौधरी, जिला परिषद सीईओ डॉ. मंजू व तत्कालीन एडिशनल सीईओ आर.के. अग्रवाल को प्रदान किया था। जिला परिषद उदयपुर को जिले में किए गए वर्षा जल संग्रहण के कार्य के लिए बेस्ट रेन वाटर हार्वेस्टिंग कैटेगिरी में राष्ट्रीय वाटर इनोवेशन अवार्ड दिया गया।
Published on:
23 Mar 2021 04:43 pm
बड़ी खबरें
View Allउदयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
