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महिदपुर में 2200 वर्ष प्राचीन है आदिनाथ दादा की प्रतिमा, किला मंदिर के नाम से जाना जाता है जिनालय

प्रतिमा को आठ बार उत्थापन का प्रयास, लेकिन प्रतिमाजी अपने स्थान पर स्थिर रही हैंडपंप के जल से होता था बीमारियों का इलाज

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उज्जैन. महिदपुर में 108 आदिनाथ दादा का जिनालय श्री शत्रुंजय आदिनाथ तीर्थधाम (किला मंदिर) ऐतिहासिक सांस्कृतिक धार्मिक नगरी महिदपुर में प्राचीन मंदिरों में से प्रमुख है। शिप्रा के आंचल में बसी धार्मिक ऐतिहासिक, पौराणिक नगरी महिदपुर जो कालांतर में मणिपुर से अपभंश होते-होते महिदपुर के नाम से पहचानी जाती है। यह नगरी 4000 वर्ष पुरानी सभ्यता की निशानियां समेटे है।

वरिष्ठ समाजसेवी व साहित्यकार जैनेन्द्र खेमसरा ने बताया, मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग द्वारा प्राचीन किले की खुदाई में इसके अवशेष पुरातत्ववेत्ता डॉ. रहमान अली ने प्रतिपादित किए। यहां प्राचीन किले में लगभग 1200 वर्ष पुराना भगवान आदिनाथ का जिनालय स्थित है और इसी जिनालय में 2200 वर्ष प्राचीन राजा सम्प्रति के काल की भगवान आदिनाथजी की अत्यंत मनोहारी चमत्कारिक प्रतिमा विराजमान है। इस प्रतिमा को पूर्व में आठ बार उत्थापन का प्रयास करने पर भी यह प्रतिमाजी अपने स्थान पर स्थिर रही, नहीं उठी। मंदिरजी के आसपास प्राचीन किले के विशाल अवशेष, राजमहल, कुंड और अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य से सारा वातावरण, परिसर साधना एवं शांति के लिए मानो प्रभु का वरदान है। दादा आदिनाथ जन-जन की आस्था के केन्द्र है। पूरे मालवा एवं देशभर में दादा के भक्त फैले हुए है। दादा आदिनाथ की मनोहारी प्रतिमा दिन में तीन रूप धारण करती हैं।

श्री शांतिनाथजी मंदिर - दूसरे प्रमुख मंदिर में श्री शांतिनाथजी मंदिर अत्यंत प्राचीन है। इसके इतिहास के बारे में पूवर्जों से सुना है कि कालांतर में एक यति इस प्रतिमा को उड़ाकर कही ले जा रहे थे, परंतु चमत्कारिक मनोहर प्रतिमा महिदपुर में इस स्थान पर थम गई। यति द्वारा कई प्रयासों के बाद भी यहां से नहीं हिली तब इसी स्थान पर इसे स्थापित कर प्रतिष्ठा की गई। वतर्मान में मंदिर के जीर्णोद्धार का विचार चल रहा है। यह सभी के आस्था का केन्द्र है। मंदिर प्राचीन एवं ही सुन्दर है। नगर में अन्य मंदिर जिसमें प्रमुख रुप से चिन्तामणि पाश्वर्नाथ मंदिर, नूतन जैन मंदिर, नारायणा रोड़ स्थित लाल मंदिर एवं श्री जिनदत्त सूरी दादावाड़ी, श्री शांतिनाथ जैन मंदिर हस्तिनापुर भीमाखेड़ा में स्थित है।

बब्रूवाहन ने इसी स्थल पर करवाया था यज्ञ - कहा जाता है अर्जुन के पुत्र बब्रूवाहन ने इसी स्थल पर विशाल यज्ञ करवाया था इसलिये इस स्थान पर आज भी राख के ढेर है जितना खोदे यज्ञ की राख ही राख निकलती है। ऐसी महत्वपूर्ण नगरी में आदिनाथ दादा के जिनालय का जीर्णोद्धार होकर श्री शत्रुंजय अदिनाथ तीर्थ धाम के रुप में एक अनूठे नायाब तीथर्धाम का निर्माण हुआ है, जो सारे देश के जैन तीर्थो में अपने निर्माण को लेकर के श्रद्धालुओं के लिए अनोखा है।

प्रतिमा को नये शहर में लाने के अनेक प्रयास किए, किंतु असफल रहे
कालांतर में प्राचीन महिदपुर इसी किले में बसा था। यहीं जैन परिवारों के साथ अन्य समाज की बस्तियां थी जिनमें महाराष्ट्रीयन परिवार भी प्रमुखता से थे। काल के थपेड़ों में बाढ़ो की विभिषका से यहां से बस्ती धीरे धीरे कम होती चली गई और नये महिदपुर का किले के बाहर निर्माण हुआ। जैन परिवारों और बस्ती के यहां से विस्थापित होने पर आदिनाथ दादा की प्रतिमा को नये शहर में लाने के अनेक प्रयास हुए किन्तु यह प्रतिमाजी यहां से नहीं उठी। सारे प्रयास निष्फल हुए। शायद प्रभु की यहीं मर्जी थी कि यह स्थल विशाल तीर्थधाम के रुप में परिणित हो। आचार्य देवेश प्रवचन प्रभावक सागरचन्द्र सागर सू.म.सा. ने अपने गुरुदेव के इस स्वप्न को साकार किया।

इसी प्राचीन मंदिर के पास कालान्तर में पेयजल के लिए एक हैंडपंप था जिसके जल सेवन से अनेक बिमारियों का अचूक इलाज हो जाता था। जल यहां से भक्तगण पूरे देश में संग्रहित करके मानव सेवा के लिए व्याधियों की रोकथाम में उपयोग किया जाता था। इसी स्थल के नजदीक क्षिप्रा के रमणिक मंदिर सुंदर घाट कल-कल करती क्षिप्रा की लहरें और रावलाघाट के आगे स्थित भस्माटेकरी आज भी इस नगर के धार्मिक वैभव को दर्शाती है।