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कलेक्टर के चौथे आदेश से नाराज हाईकोर्ट ने लगाया हर्जाना

हाईकोर्ट ने शासन और संबंधित अधिकारियों पर नाराजगी जाताई, कलेक्टर ने चौथी बार जिलाबदर किया।

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उज्जैन. नागदा के एक युवक को जिलाबदर करने के आदेश पर हाईकोर्ट ने शासन व संबंधित अधिकारियों पर नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने शासन व संबंधित अधिकारियों को फटकारते हुए जिलाबदर के आदेश को न सिर्फ कानूनी शक्तियों के दुरुपयोग करने की बात कही, बल्कि शासन को याचिकाकर्ता को पांच हजार रुपए हर्जाना देने के निर्देश दिए है। दरअसल, थाना बिरलाग्राम के प्रतिवेदन पर जिला कलेक्टर की अनुशंसा पर वर्ष 2020 में अजय मेवाती निवासी बादीपुरा को चौथी बार जिलाबदर किया गया।

पुलिस व कलेक्टर की कार्रवाई को अजय मेवाती ने हाईकोर्ट इंदौर में चुनौती दी। प्रकरण में सुनवाई कर रहे न्यायाधीश विवेक रुसिया के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील मकबूल मंसूरी ने राजनीतिक दबाव व अधिकारियों की मनमानी के कारण यह कार्रवाई की जाना बताई। अभिभाषक मंसूरी ने कोर्ट को बताया कि उनके क्लाइंट अजय मेवाती जिलाबदर करने का कोई ठोस व वैधानिक आधार नहीं होने के बावजूद कलेक्टर ने कानूनी अधिकारों का गलत तरीके से इस्तेमाल करते हुए याचिकाकर्ता को परेशान करने की नीयत से जिलाबदर की कार्रवाई की गई।

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अभिभाषक की दलील व सबूतों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कलेक्टर द्वारा की गई जिलाबदर की कार्रवाई को गलत माना। साथ ही कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित करने वाली कार्रवाई में संबंधित अधिकारी को अत्यंत ही सर्तकता एवं सावधानी बरतनी चाहिए। कोर्ट ने माना कि अजय मेवाती को जिलाबदर करने में अधिकारियों ने लापरवाही की है। इसके लिए कोर्ट ने शासन को याचिकाकर्ता को पांच हजार रुपए हर्जाना देने का आदेश देती है और जिलाबदर की कार्रवाई को निरस्त की जाती है।

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12 में से 9 प्रकरणों में दोषमुक्त
तत्कालीन कमिश्नर के आदेश निरस्त करने के बावजूद जिलाबदर किया याचिकाकर्ता अजय मेवाती का कहना है कि बिरलाग्राम पुलिस थाने में उसके खिलाफ कुल 12 अपराधिक मामले दर्ज थे। जिसमें से 9 मामलों में कोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर दिया है। अब तीन मामले कोर्ट में विचाराधीन है। मगर राजनैतिक दबाव के चलते बिरलाग्राम पुलिस ने इन्हीं प्रकरणों में उसके खिलाफ चार बार जिला बदर की कार्रवाई की है। पहली बार वर्ष 2016 में तीन माह के लिए उसे जिलाबदर किया गया था। इसके बाद 207 में तीन महीने के लिए जिलाबदर करने के बाद 2019 में फिर एक साल के लिए जिलाबदर किया गया था। जिस पर तत्कालीन कमिश्नर ने मामले को जिलाबदर लायक नहीं माना और आदेश वापस लेना पड़ा। फिर 2020 में उसे दोबारा एक साल के लिए जिलाबदर कर दिया गया। अजय के अनुसार मनमानी ढंग की गई कार्रवाई के विरोध में उन्हें हाईकोर्ट की शरण लेना पड़ी। इस दौरान उन्हें करीब 11 महीने तक जिलाबदर रहना पड़ा।

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