
एक बार पंजीयन के बाद मरीजों को शहर आने की आश्यकता भी नहींं लेकिन अभी और जागरुकता बढ़ाना होगी,एक बार पंजीयन के बाद मरीजों को शहर आने की आश्यकता भी नहींं लेकिन अभी और जागरुकता बढ़ाना होगी,एक बार पंजीयन के बाद मरीजों को शहर आने की आश्यकता भी नहींं लेकिन अभी और जागरुकता बढ़ाना होगी
उज्जैन.
शहर से ८० किलोमीटर दूर सुदुर गांव में रहने वाले बुजुर्ग रामलाल शक्कर के इलाज को लेकर परेशान नहीं है। उन्हें पता है, घर के नजदीक ही स्वास्थ्य केंद्र से उन्हें महीनेभर की दवा मिल जाएगी। परेशानी कम-ज्यादा हुई भी तो मोबाइल के जरिए शहर के बड़े डॉक्टर बता देंगे। उनको यह निश्चिंतता जिले से गांव तक बनी उपचार की मजबूत चेन से मिली है। शुगर को इस चेन से हराया जा सकता है, जरूरत बस इससे जुडऩे की है।
जिले में करीब १० फीसदी लोग डायबिटीज की चपेट में हैं या इससे ग्रसीत होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। इनमें बड़ी संख्या ग्रामिणों की भी है। यह अधिक चिंताजनक है क्योंकि जागरुकता और उपचार सुविधा के मामले में गांवों में अभी भी तुलनात्मक कमी है। इसलिए ग्रामिण क्षेत्रों में डायेबिटीज के बढ़ते खतरे को रोकना मुख्य चुनौती है। इस बड़ी चुनौती के बीच अच्छी खबर है कि जिला मुख्यालय से सुदुर गांव तक शुगर के उपचार के लिए स्वास्थ्य प्रशासन ने मजबूत चेन तैयार की है। इसमें जांच से लेकर उपचार, दवाईयों के वितरण और फालोअप तक की व्यस्था है।
जितने मरीज, उससे काफी कम चिन्हित
शुगर व बीपी जैसे असंचारी रोगों को लेकर जिला अस्पताल में विशेष चिकित्सा केंद्र स्थापित है। केंद्र में पंजीकृत होने वाले शुगर के मरीजों की संख्या में लगातर बढ़ोतरी हो रही है। वर्तमान में हर महीने डायबिटीज के २५० से अधिक मरीज इस केंद्र में पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद जिले में डायबिटीज के जितने मरीज हैं, उनकी तुलना में यह आंकड़ा काफी कम है। मसलन अभी भी शुगर से निपटने के लिए बनाई गई जिला मुख्याल से गांव तक की स्वास्थ्य चेन से अन्य मरीजों को जोडऩे की आवश्यकता है। विशेषकर ग्रामिणों को ताकि उनका उपचार व फालोअप नियमित चल सके।
शुगर से जीतने गांव तक पहुंचा रहे दवाई
- एनसीडी (नोन कम्युनिकेबल डिसिज) के लिए जिला मुख्यालय पर प्रथक से चिकित्सा केंद्र स्थापित है।
- मुख्य केंद्र की तरह जिले में १२ सिविल अस्पतालों में भी ऐसे सहायक केंद्र हैं।
- इन केंद्रों पर असंचयी रोगों की जांच, उपचार, दवाई, कंसलटेंसी आदि सुविधा उपदलब्ध है।
- जिला केंद्र पर मरीज के आने पर उसका पंजीयन किया जाता है। आभा आइडी बनाया जाता है।
- आभा आइडी में उसके स्वास्थ्य संबंधित सभी जानकारियां फिड की जाती है।
- मुख्य केंद्र पर पंजीकृत होने के बाद मरीज जिले में किसी भी सुदर गांव का रहने वाला हो, उसे उपचार के लिए बार-बार शहर आने की आवश्यकता नहीं होती।
- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रो के साथ ही गांवों में सीएचओ (कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर) नियुक्त हैं। इनके पास एनसीडी जांच की सुविधा व दवाईयां उपलब्ध रहती हैं।
- मरीज का कार्ड देखकर सीएचओ उसे गांव में ही १५ या ३० की दवाई नि:शुल्क उपलब्ध करा देते हैं।
- दवाई देने के बाद सीएचओ पोर्टल पर मरीज व उसे दी गई दवाईयों की जानकारी फीड करते हैं। इससे जिला मुख्यालय से लेकर भोपाल तक जानकारी पहुंच जाती है कि मरीज को दवाई मिली या नहीं।
- आशा कार्यकर्ता गांव में डायबिटीज के मरीज को महीने में एक बार स्वास्थ्य केंद्र या सीएचओ के पास आने के लिए प्रेरित करती है ताकि हर महीने मरीज का फालोअप हो सके।
- जांच में यदि पाया जाता है कि दवाई लेने के बाद भी मरीज की शुगर नियंत्रण में नहीं आ रही है तो सीएचओ अपने मोबाइल से टेली कंसलटेशन एप के जरिए जिला मुख्यालय पर बैठे विशेषज्ञ चिकित्सक एमडी मेडिसिन से संपर्क करवाकर दवाई में बदलाव या उपचार में जरूरी संशोधन किया जाता है।
- आवश्यक होने पर शासकीय वाहन से मरीज को शहर लाने की भी व्यवस्था है।
इनका कहना
शुगर के मरीजों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। हमारा प्रयास है कि शहर के साथ ग्रामिण क्षेत्रों में भी समय पर डायबिटीज के मरीज चिन्हित हों और वहीं उन्हें उपचार सुविधा मिले। इसके लिए जिला मुख्यालय से गांव तक उपचार व्यवस्था की चेन तैयार की गई है। किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधित कोई समस्या है तो वह इसे नजर अंदाज न करते हुए जांच अवश्य करवाएं।
- डॉ. रौनक एलची, जिला नोडल अधिकारी एनसीडी
Published on:
31 Jul 2023 12:57 pm

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