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उज्जैन. प्रीमेच्योर नवजातों को ऑक्सीजन की अधिकता के चलते होने वाली अंधत्व की गंभीर बीमारी के चलते एसएनसीयू वार्ड में इसका उपयोग कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। बीते तीन महीने में यहां उपयोग होने वाली ऑक्सीजन की मात्रा 52 प्रतिशत तक कम की गई है। नौनिहालों को रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी से बचाने के लिए नवीन एक्शन प्लान तैयार किया गया है। जिसके चलते यहां पहुंचने वाले नौनिहालों को सीधे ऑक्सीजन नहीं दी जाती है। जांच और आवश्यतानुसार उन्हें ऑक्सीजन दी जाती है।
35 सप्ताह से कम और दो किलो से कम वजनी शिशुओं को एसएनसीयू वार्ड में रखा जाता है। इनके फेफड़े और अन्य अंग कम विकसित होते हैं, जिस वजह से इन्हें कृत्रिम वातावरण में ऑक्सीजन पर रखा जाता है, लेकिन हाल ही में हुई शोध के अनुसार नवजात को आवश्यकता से अधिक ऑक्सीजन देने पर उन्हें रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमैच्योरिटी अर्थात आरओपी होने की संभावना बढ़ जाती है। इसमें शिशु के नेत्र की रेटिना सिकुड़ जाती है अथवा जगह से हट जाती है। जिस वजह से उसे दिखाई देना बंद हो जाता है। इंदौर और नई दिल्ली में होने वाली लेजर एवं वीआर सर्जरी के जरिए ही इसका उपचार संभव है। यदि समय सर्जरी नहीं की जाए तो शिशु जीवनभर के लिए आंख की रोशनी खो सकता है। इसके डायग्नोस करने के लिए हर मंगलवार को नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.निलेश चंदेल एसएनसीयू में भर्ती एवं डिस्चार्ज शिशुओं की स्क्रीनिंग करते हैं। बीते डेढ़ वर्ष में चरक अस्पताल में संचालित एसएनसीयू वार्ड में एेसे २० मामले सामने आए है। जिसके चलते एसएनसीयू वार्ड में ऑक्सीजन के अधिक उपयोग को रोकने के लिए नया एक्शन प्लान तैयार कर आरओपी के मामलों पर रोक लगाने के प्रयास किए जा रहे है।
नया एक्शन प्लान पर कर रहे काम
एसएनसीयू वार्ड प्रभारी डॉ. दिलीप वास्के ने बताया एसएनसीयू में आने वाले शिशुओं के उपचार के लिए नया एक्शन प्लान तैयार किया है। शिशु को आने के बाद करीब एक से डेढ़ घंटे तक वार्मर पर रखा जाता है। इसके बाद पल्स ऑक्सी मीटर से उसके हिमोग्लोबिन में ऑक्सीजन की मात्रा की जांच की जाती है। सामान्यत: ये मात्रा 88 से 93 प्रतिशत होती है। यदि इससे कम ऑक्सीजन पाई जाती है तो शिशु को ऑक्सीजन दी जाती है। इसके बाद हर छह घंटे में जांच करते हैं। आवश्यकता होने पर ही दोबारा ऑक्सीजन देते हैं। 52 प्रतिशत तक कम किया उपयोग-बीते तीन महीने में एसएनसीयू वार्ड में ऑक्सीजन का उपयोग 52 प्रतिशत तक कम किया है। इस दौरान करीब ४ लाख की ऑक्सीजन की बचत की गई। इसका सबसे सुखद परिणाम ये सामने आया कि इस दौरान आरओपी डायग्नोस की संख्या भी बेहद कम हो गई है। इस वर्ष की शुरूआत से ही ऑक्सीजन के कम उपयोग पर काम हो रहा है। जिसके चलते इस वर्ष फोर्थ ग्रेड आरओपी एक मात्र शिशु मिला है। जिसका उपचार करवाया जा चुका है।
277 में से 133 को दी ऑक्सीजन
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.अशोक मित्तल ने बताया एसएनसीयू में बढ़ते आरओपी को मामलों के चलते स्वास्थ्य मुख्यालय में इसकी कार्यशाला आयोजित की गई। जिसमें चरक अस्पताल में संचालित एसएनसीयू वार्ड में ऑक्सीजन का उपयोग कम करने और इसके प्रभाव, परिणाम संबंधित प्रोजेक्ट दिया गया। जिसके तहत जनवरी में भर्ती कुल 277 बच्चों में से 133 को ऑक्सीजन दी गई। इनमें से भी 92 बच्चों को 6 घंटे से कम ऑक्सीजन दी गई। 144 बच्चों को बगैर ऑक्सीजन दिए उपचार किया। इसका परिणाम ये हुआ कि इस महीने एसएनसीयू वार्ड में भर्ती बच्चों में से केवल एक को आरआेपी डायग्नोस हुआ।
Published on:
05 Aug 2018 06:26 pm
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