
उज्जैन. जर्मनी, फ्रांस सहित अन्य देश हमारी संस्कृति और संस्कारों को अपनाकर आगे बढ़ रहे हैं और हमारे ही देश में पीढि़यां संस्कारविहिन हो रही हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह देशवासियों द्वारा परंपराओं और संस्कृति की उपेक्षा करना है। वर्तमान दौर में बढ़े हत्या, दुष्कर्म और गंभीर अपराधों को कम करने के लिए सबसे ज्यादा जरूरत नई पीढ़ी को संस्कारित करने की है, जिसकी शुरुआत गर्भकाल से ही होना चाहिए। तभी जाकर युवक-युवतियों में पैतृक संस्कार आ सकेंगे। ये बात प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने पाटीदार समाज की महिला संगठन के प्रांतीय अधिवेशन में कही।
रविवार दोपहर १२.३० बजे राज्यपाल चिंतामण गणेश स्थित सूरज गार्डन में आयोजित पाटीदार समाज के महिला संगठन के प्रांतीय सम्मेलन में पहुंची। इस दौरान राज्यपाल ने बताया कि गुजरात में मंत्री पद पर रहते हुए उन्हें एक बार जर्मनी जाने का मौका मिला। तब उन्होनें वहां के स्कूल देखने की इच्छा जताई। वहां के स्कूलों में माता-पिता को गर्भकाल के एक महीने से संस्कारित शिक्षा दी जाती है। जन्म के बाद ८ वर्ष की आयु तक बच्चों को विशेष रूप से शिक्षा प्रदान की जाती है। उन्होंने जब वहां के शिक्षण संस्थानों से इस प्रकार की शिक्षा का कारण पूछा तो उन्होंने महाभारत और भारतीय वेद पुराणों में वर्णित सोलह संस्कार शिक्षा का उदाहरण दिया। इसी के आधार पर जर्मनी में बच्चों को संस्कारित शिक्षा देना आरंभ किया। हमारे देश में आदि-अनादि काल से ये परंपरा चली आ रही थी, लेकिन पश्चिम के प्रभाव ने शिक्षा को दिगभ्रमित कर दिया।
घूंघट प्रथा का किया विरोध
उद्बोधन के दौरान राज्यपाल ने घूंघट प्रथा का विरोध करते हुए इसे इसी वक्त से त्यागने की अपील की। राज्यपाल ने बताया कि वे गुजरात में ५० वर्ष पूर्व ही इस प्रथा का खत्म कर चुकी है। इसके अलावा महंगी शादी की भी वे विरोधी हैं। उन्होंने बेटे और बेटी की शादी तक पांच रिश्तेदारों जिनमें ड्राइवर भी शामिल था कि उपस्थिति में की। बेटी की शादी में उसके सास-ससुर तक नहीं आए। क्योंकि शादी में केवल पांच लोगों के आने की शर्त थी। इस प्रकार से पैसे की जो बचत हुई उसेे बेटे और बेटी को दे दिया, जिससे उन्होंने व्यापार आरंभ किया।
भतीजे के बाल विवाह में बुलाई पुलिस
राज्यपाल ने बताया कि समाज की कुरीतियों को खत्म करने की शुरुआत अपने ही घर से होना चाहिए। भतीजे का बाल विवाह रुकवाने के लिए उन्हें पुलिस बुलानी पड़ी थी। जिस वजह से उन्हें भाई-भाभी ने पांच साल तक नहीं बुलाया था। लेकिन उन्होंने विरोध झेलते हुए बाल विवाह नहीं होने दिया। इसके बाद से परिवार और धीरे-धीरे समाज में बाल विवाह बंद हो गए।
चढ़ावे की राशि से मिटाएं कुपोषण
पाटीदार समाज के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद राज्यपाल महाकाल दर्शन करने पहुंची। यहां उन्होंने दर्शन के बाद कहा कि महाकाल मंदिर के माध्यम से सामाजिक और शैक्षणिक सरोकार के कार्य की भी शुरुआत होनी चाहिए। बच्चों को कुपोषण से बचाने में मंदिर प्रबंध समिति भी सहयोग दें। इसके लिए राज्यपाल ने मंदिर में आने वाले चढ़ावे की राशि का भी उपयोग करने की सलाह दी।
Published on:
06 May 2018 08:00 pm

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