पुराणों में इसका उल्लेख हमें देखने पर अवश्य मिलेगा कि, जब इस पृथ्वी की रचना के लिए भगवान श्री महादेव ने परमपिता श्री ब्रह्मा जी को निर्देशित किया,उन्होंने जो सर्वप्रथम राष्ट्र का निर्माण किया था वह भारत ही है।
उज्जैन। भारतीय संस्कृति और सभ्यता को विश्व में सबसे प्राचीन कहा जाता है। ऐसी मान्यता प्रचलित है।सर्वप्रथम सृष्टि का उदय भी इसी राष्ट्र से हुआ था। पुराणों में इसका उल्लेख हमें देखने पर अवश्य मिलेगा कि, जब इस पृथ्वी की रचना के लिए भगवान श्री महादेव ने परमपिता श्री ब्रह्मा जी को निर्देशित किया,उन्होंने जो सर्वप्रथम राष्ट्र का निर्माण किया था वह भारत ही है। जिसे हम भारतीय 'सृष्टि का निर्माण दिवस गुड़ी पड़वा' उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस दिन को हम दूसरे शब्दों में संसार की उत्पत्ति का दिन,धरती के उत्सव का पर्व या सृष्टि का जन्म दिवस भी कहते हैं।यह एक विशेष दिन के रूप में जाना जाता है।
सृष्टि के कार्य की रचना आरंभ
सतयुग में इसी दिन सृष्टि के कार्य की रचना आरंभ की गई थी। प्राचीन मान्यता के अनुसार ब्रह्म पुराण में लिखा गया है कि आज से ही देवी देवताओं ने सृष्टि के संचालन का कार्य प्रारंभ किया था।आज के दिन से रात की अपेक्षा दिन का तापमान अधिक होने लगता है।ईरानियों में आज ही के दिन नोरोज़ मनाया जाता है। शांति संप्रदाय एवं शास्त्रों के अनुयायियों के अनुसार इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ होता है। जिसको हम वर्तमान में बड़ी नवरात्र या चैत्र नवरात्र के नाम जानते हैं और मंगल प्रार्थना करते हैं कि पूरा वर्ष भर हमारे परिवार,समाज और राष्ट्र के लिए शुभ लाभकारी हो।इसी दिन से दुर्गा माता का नों दिनों तक पाठ कर देवी आराधना की जाती है।
त्रेतायुग में बुराइयों पर अच्छाई के युद्ध में अधर्म पर धर्म की विजय हुई
त्रेतायुग में बुराइयों पर अच्छाई के युद्ध में अधर्म पर धर्म की विजय हुई और भगवान श्री राम का इसी दिन राज्याभिषेक हुआ। जब भगवान श्री राम राक्षस आतंक रावण का वध कर अयोध्या वापस पधारे तो अयोध्या के नगर वासियों ने उनके स्वागत संस्कार में आतुर होकर अपने-अपने घरों के ऊपर एक लकड़ी,एक सुंदर साडी,एक गिलास ,कुछ नीम के पत्ते और मिठाई के रूप में गुड़ धनिया बांधकर विजय का प्रतीक अपने घरों के ऊपर बांध दिया और इन सब को एक साथ गांठ लगाने या बांधने पर आगे चलकर इसे गुड़ी का पर्व गुड़ी पड़वा कहा जाने लगा। प्रभु श्रीराम के स्वागत में सभी जाति-वर्ग के लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र,शामिल थे तो अब क्यों नहीं ? यह पर्व सिर्फ सीमित वर्गों तक होकर रह गया है। इसी दिन नीम के पेड़ पर नई पत्तियों का आना शुरू हो जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इसका सेवन करने से अनेक प्रकार की बीमारियां दूर होती है। मिठाई के रूप में गुड़ धनिया लेते हैं,हिंदू धर्म के अनुसार गुड़ और धनिये का अत्यंत महत्व है। दिप पर्व की शुरुआत भी इनकी पूजा से प्रारंभ होती है।
द्वापर युग महा भारतकाल में असत्य पर सत्य को यश मिला
द्वापर युग महा भारतकाल में असत्य पर सत्य को यश मिला और युधिष्टिर संवत का प्रारंभ हुआ। इस पवित्र भूमि पर जन्में महान अंतरिक्ष विज्ञानी आर्यभट्ट ने कहा था कि हिंदू कालगणना सूर्य एवं चंद्रमा दोनों की गति पर आधारित विश्व की सबसे व्यापक कालगणना है। वेद तो माँ वसुंधरा का गुणगान करते हुए कहते हैं। हे ! पृथ्वी तुम्हारे ऊपर नियमित रूप से ऋतु चक्र घूमता है। ग्रीष्म, वर्षा,शरद,हेमंत,बसंत तथा शिशिर ये सभी ऋतु अपने-अपने तरीके से प्रतिवर्ष तुम्हारे चरणों में लेखा अर्पण करते हैं।हर संवत का लेखा असीम है और संस्कृति किसी न किसी रूप में कायम है। त्यौहार हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है।मनुष्य जाति का जीवन इन उत्सव में समाया हुआ है। हमारी कालजयी संस्कृति के अनुसार इसी दिन प्रातः जल्दी स्नान कर भगवान की आराधना करने के पश्चात हमारी मेहनत से उगाई गई फसल का सर्वप्रथम दर्शन करना चाहिए। जिससे वर्षभर हरियाली और अन्न का भंडार बना रहे।कभी भी राष्ट्र में अन्न की कमी ना हो।
कलयुग में मालवा के नरेश सम्राट विक्रमादित्य
कलयुग में मालवा के नरेश सम्राट विक्रमादित्य द्वारा विदेशी आक्रमणकारियों से राष्ट्र को बचाने के अभियान की सफलता का प्रतीक हुआ और नये संवत विक्रम संवत (शौर्य पर्व) का उदय हुआ। मालवाधीश विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त करने के बाद अपना नया संवत शुरू किया जिसे हम भारतीय गुड़ी पड़वा, चैती चांद,संवत्सर के रूप में मानते हैं। इस दिन का कितना महत्व है इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है।किसी भी राजा को अपना संवत चलाने के लिए शासकीय विधि का पालन करना पड़ता है।शासकीय विधि यह- कि जो राजा व शासक अपने महान कर्म या विजय की स्मृति के लिए अपना संवत चालू करने के पहले अपने राज्य की पूरी जनता का ऋण अपनी ओर से उन्हें चुकाना पड़ता है तथा उतने ही रुपए की स्वर्ण मुद्राए को राजकोष में जमा कराना होता है। सतयुग- में श्री ब्रम्हाजी ने,त्रेतायुग में-भगवान श्री राम ने,द्वापरयुग में-युधिष्ठिर ने ओर कलयुग में-सम्राट विक्रमादित्य ने इन्हीं विधि का पालन कर अपना संवत आरंभ किया था। कालगणना एवं नववर्ष की अवधारणा संसार मे सभी समाजों में है। हमारे देश मे भी कई तरह के संवत प्रचलित रहे है। उनमें से कुछ काल के गर्भ में समा गए तथा कुछ अभी भी प्रचलित है।
इस दिन का वास्तविक भावार्थ
गुड़ी अर्थात 'विजय पताका' तथा पड़वा अर्थात 'प्रतिपदा' को कहा जाता है। गुड़ी पड़वा एक मराठी शब्द है। इसमे पड़वा मूल रूप से संस्कृत से लिया गया शब्द है। इस प्रकार इस दिन का वास्तविक भावार्थ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा या गुड़ी पड़वा है। इस दिन को नये साल के रूप में भव्य समारोह के तहत 'विजयध्वय' प्रतीक के रुप में श्री छत्रपति शिवाजी महाराज ने मनाया था। सम्पूर्ण देश के साथ आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में इस पर्व को 'उगादि' के नाम से प्रमुखता से मनाया जाता है। आज भी महाराष्टीयन भाषी परिवारों में घर के आंगन में गुड़ी खड़ी करने की अपनी प्राचीन परंपरा को निभाया जा रहा है।विजय का प्रतीक होकर यह गुड़ी वर्षभर के लिए हम मे सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है भगवान विष्णु ने भी अपने मत्स्य अवतार के लिए इस दिन को ही चुना था। प्रत्येक त्यौहार अपनी पावन परंपरा में कोई न कोई उद्देश्य, आदर्श,इतिहास,सांस्कृतिक सभ्यता,सामाजिक मान्यता महत्व को प्रकाशित करता है। समाज या धर्म को सवारने का प्रयत्न करता है। भारत त्योहारों का देश है त्यौहारो की पवित्रता को आंकना संभव न के बराबर है। इन्हीं त्यौहारों की परंपरा में' वर्ष प्रतिपदा गुड़ी पड़वा' भी एक है।- आर्टिकल, मोहित राजे
Published on:
02 Apr 2022 11:38 am
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