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भाग-दौड़ भरी जिंदगी में तांगे पीछे छूटे, सडक़ों पर हो गई वाहनों की रैलमपेल

कभी सडक़ों पर सरपट दौड़ा करते थे तांगे, अब भूखे मरने की आई नौबत, सरकार ने कभी इनका संरक्षण करने की नहीं सोची, तांगा हमेशा से शान की सवारी रहा, इसकी जगह अब मोटर गाडिय़ों ने ले ली

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Horse cart best choice for environment

कभी सडक़ों पर सरपट दौड़ा करते थे तांगे, अब भूखे मरने की आई नौबत, सरकार ने कभी इनका संरक्षण करने की नहीं सोची, तांगा हमेशा से शान की सवारी रहा, इसकी जगह अब मोटर गाडिय़ों ने ले ली

उज्जैन. दिन ब दिन बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दाम को देखते हुए आज वो पुराना जमाना याद आ रहा है, जब सडक़ों पर तांगे सरपट दौड़ा करते थे। न पेट्रोल की चिंता, न डीजल का खर्च। बस घोड़े को चारा और दाना-पानी देते रहो...। लेकिन अब भागमभाग का जमाना है। हर किसी को जल्दी पहुंचना है। इसी भाग-दौड़ भरी जिंदगी में तांगे कहीं पीछे छूट गए और सडक़ों पर वाहनों की रैलमपेल हो गई। अब इन्हें चलाने वालों के सामने भूखे मरने की नौबत आ गई है।

छोटी-छोटी गलियों से लेकर आलीशान सडक़ों तक घोड़ों के टॉप और घुंघरुओं की आवाज के साथ-साथ तांगेवालों का शोर...बाजू हट जाना साहब...ऐ भाई जरा हटके चलो...हम कभी नहीं भूल सकते। तांगे में बैठकर घूमना, स्कूल जाना, स्टेशन से घर पहुंचना, बाहर से आने वाले श्रद्धालु तो उज्जैन दर्शन भी तांगे में बैठकर ही करते थे। अब न तांगे बचे न इन्हें चलाने वाले। सरकार की तरफ से भी कभी इनके संरक्षण के बारे में विचार नहीं किया गया, जबकि यह घोड़ा गाड़ी पर्यावरण के लिए सबसे सही विकल्प है।

अब ये ओल्ड फैशन हो गया
ब्राह्मण गली निवासी दिनेश राठौर, जो कि लगभग 80 साल पुराने तांगे में घोड़ा जोतकर हीरामिल की चाल के नजदीक मिले। उनसे चर्चा की तो उन्होंने बताया कि हमारा यह पुश्तैनी धंधा रहा है। हमारे बाप-दादा भी यही करते थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई। तांगे चलना बंद हो गए, ये अब ओल्ड फैशन समझा जाने लगा है। लोग हमें हिकारत की नजरों से देखते हैं। फिल्मों से लेकर बड़े-बड़े महलों तक घोड़ा-बग्घी हुआ करते थे। एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए भी घोड़ों का इस्तेमाल होता था।

परिवार पालना मुश्किल, घोड़े कैसे पालें
दिनेश राठौर ने बताया कि घोड़ा ऐसा जानवर है, जिसे खुले रूप में रोड़ पर भी नहीं छोड़ सकते कि कहीं गाय की तरह चर ले, न ही किसी को दान दे सकते, क्योंकि यह कोई दूध तो देता नहीं। ऐसे समय में हमारे सामने तांगा चलाना मुश्किल हो रहा है। परिवार को पालें या घोड़े को खिलाएं।

शादी-ब्याह और जुलूस से आसरा
तांगा चलाने का काम अब बंद हो गया। घोड़ा सिर्फ शादी-ब्याह के काम का रह गया। इसके अलावा यदि कोई बड़ा चल समारोह या जुलूस आदि निकल रहे हों, तो हमें घोड़ा लगाने का ऑर्डर मिल जाता है, लेकिन उससे जीवन नहीं चलता साहब। उसमें क्या घोड़े को खिलाएं और क्या हमारे परिवार को।

व्हीकल लोन मिलने लगा, तांगे घर रखा गए
सडक़ों पर साल-दर-साल वाहनों की बाढ़ सी आ गई, उसके पीछे बैंकों द्वारा व्हीकल लोन दिया जाना बड़ा कारण रहा है। इस वजह से तांगे घरों में रखा गए, घोड़े सिर्फ जुलूसों में लगने लगे और परिवार भूखे मरने लगे। सरकार से कई बार मदद की गुजारिश की, लेकिन आज तक कोई मदद नहीं मिली।

सरकार प्रोत्साहन दे, तो तांगे वाले फिर से आत्मनिर्भर हो जाएं
दिनेश राठौर का कहना है कि यदि सरकार थोड़ा सा प्रोत्साहन दे दे, तो तांगे वाले फिर से आत्मनिर्भर हो सकते हैं। जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सभी को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे हैं, उस दिशा में उन्हें और राज्य सरकार को एक बार विचार करके तांगेवालों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।