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video शाही अंदाज में निकले तीनों लोक के राजा महाकाल, भोले की भक्ति में झूम उठे भक्त

महाकालेश्वर की कार्तिक-अगहन मास की चौथी व शाही सवारी सोमवार शाम 4 बजे परंपरानुसार निकाली गई।

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उज्जैन. महाकालेश्वर की कार्तिक-अगहन मास की चौथी व शाही सवारी सोमवार शाम 4 बजे परंपरानुसार निकाली गई। श्रावण-भादौ मास की तरह ही कार्तिक अगहन मास की शाही सवारी निकली, परंतु अगहन मास की सवारी में केवल भगवान महाकाल की पालकी ही निकली, अन्य विग्रह (मुखार विंद) आदि नहीं शामिल हुए। रजत जडि़त पालकी में भगवान चन्द्रमौलेश्वर विराजमान थे।

शिवमय हुई महाकाल की नगरी
कार्तिक-अगहन मास में निकलने वाली भगवान महाकाल की सवारियों के क्रम में अगहन मास के सोमवार को शाही सवारी निकली। रास्तेभर भोले के जयकारे और भजन कीर्तन होता रहा। सभामंडप में महाकाल के स्वरूप चांदी के मुघौटे का पूजन किया। पूजन के बाद शाम 4 बजे महाकाल मंदिर से सवारी शुरू हुई।

ढोल-मंजीरों से महाकाल का कीर्तन
कार्तिक एवं अगहन मास में प्रतिवर्ष निकाली जाने वाली सवारियों के क्रम में सोमवार को राजाधिराज महाकाल की शाही सवारी धूमधाम से निकली। ढोल-ढमाकों और जयकारों के साथ भगवान महाकाल चांदी की पालकी में विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकले तो भक्तों ने अपने आराध्यदेव के दर्शन किए।

मुख्य द्वार पर गार्ड ऑफ ऑनर
शाही सवारी निकालने के पहले महाकाल मंदिर के सभा मंडप में विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया। मंदिर के मुख्य द्वार पर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। सवारी महाकाल मंदिर से चली और गुदरी, बक्षी बाजार, कहारवाड़ी होते हुए रामघाट पहुंची, जहां तीनों लोकों के नाथ का शिप्रा के पावन जल से अभिषेक कर आरती उतारी गई। इसके बाद सवारी आगे के लिए बढ़ी।

भैरव अष्टमी पर निकले थे कालभैरव
भैरव अष्टमी पर महाकाल के सेनापति बाबा कालभैरव को राजसी वस्त्र, आभूषण शृंगारित कर सवारी निकाली गई। शुक्रवार १० नवंबर को ५६ भोग लगाया गया। शनिवार ११ नवंबर को बाबा काल भैरव की सवारी धूमधाम के साथ निकली। बाबा नई पालकी में सवार होकर क्षेत्र भ्रमण पर निकले।

भैरव मंदिरों में उमड़े आस्थावान
कालभैरव मंदिर में सुबह भैरव अष्टमी पूजन किया गया। भगवान को सिंधिया घराने की ओर से समर्पित किए गए आभूषण और राजसी वस्त्र धारण कराए गए। मंदिरों में आस्थावान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। कालभैरव मंदिर के पुजारी सदाशिव महाराज एवं धर्मेन्द्र चतुर्वेदी ने बताया कि सुबह पूजन-अर्चन के साथ अष्टमी उत्सव शुरू हो गया है। सिंधिया रियासत कालीन आभूषण, चवर, पगड़ी, जरीदार वस्त्र, मालाएं धारण कराई गई। रात्रि में 56 भोग लगाकर प्रसादी वितरण किया गया। कालभैरव मंदिर को फूलों और गुब्बारों से सजाया गया है। कालभैरव मंदिर पर आकर्षक विद्युत सज्जा की गई थी।