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उज्जैन. योग दिवस और विश्व संगीत दिवस पर गुरुवार शाम महाकाल की नगरी में गायन-नृत्य और संगीत की त्रिवेणी का आयोजन हुआ। यह आयोजन कालिदास अकादमी के संकुल हॉल में शाम 7 बजे से आरंभ हुआ। बारिश की बूंदाबांदी के बीच विभिन्न रागों की प्रस्तुति में श्रोता-दर्शक आनंदित हो रस-विभोर हो रहे थे।
संगीत दिवस के अवसर पर
संगीत दिवस के अवसर पर संस्कृति संचालनालय व शासकीय माधव संगीत महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम की प्रथम प्रस्तुति मुम्बई की कलाकार गौरी पठारे ने शास्त्रीय गायन की दी। उन्होंने रागश्री में चलो रे माई राम-सिया दर्शन को...सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। दूसरी प्रस्तुति उन्होंने राग गौडमल्हार में प्रस्तुत की। गौरी ने संक्षिप्त चर्चा कहा कि संगीत ने प्रकृति को एक स्वर में बांधा है। जो लोग संगीत से दूर रहते हैं, उनके लिए संगीत दिवस जैसे आयोजन किए जाना बेहद जरूरी हैं। ग्वालियर और जयपुर घराने से ताल्लुक रखने वाली गौरी के गुरु पं. जितेंद्र अभिषेकी, पं. पद्माताई तलवलकर और पं. अरुण द्रविड़ हैं, जिनसे वे वर्तमान में शिक्षा ले रही हैं। देश-विदेश में कई मंचों पर वे प्रस्तुति दे चुकी हैं। संगीत महाविद्यालय की छात्रा पूजा चौहान ने तानपुरे पर संगत की। कार्यक्रम शुरुआत विधायक मोहन यादव, विशिष्ट अतिथि डॉ. पुष्पा चौरसिया ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप-दीपन कर की। अध्यक्षता राजेंद्रप्रसाद आर्य ने की।
निमाड़ी गीतों में घुली हास्य की फुलवारी
निमाड़ी गीतों की प्रस्तुति में हास्य की फुलवारी घुल गई। खरगौन से आए आठ सदस्यीय दल ने एक से बढ़कर एक गीतों की प्रस्तुति दी। निमाड़ी लोक दल के नाम से प्रसिद्ध इस ग्रुप के संयोजक शिव गुप्ता ने बताया कि वे करीब 26 वर्षों से गा रहे हैं, और उनके 91 एलबम निकल चुके हैं। उन्होंने नोट बंदी, बेटी बचाओ आदि कई विषयों पर गीत लिखे और देश के अनेक प्रांतों में होने वाले आयोजनों में प्रस्तुतियां दी हैं। कालिदास अकादमी के मंच पर निमाड़ी गीत संग में चलूंगा...हास्य गीत पर दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
नृत्यांजलि से किया महाकाल को नमन
भोपाल से आई आरोही मुंशी ने भरतनाट्यम पर आधारित नृत्यांजलि से भगवान महाकाल के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन कराए और उन्हें नमन किया। अपनी मां डॉ. लता सिंह मुंशी से आरोही ने चार वर्ष की उम्र से भरतनाट्यम की शिक्षा हासिल की। इसी क्षेत्र में आगे पोस्टग्रेजुएट होना चाहती हैं। मंच पर उन्होंने लाइट-साउंड के बीच आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा रचित पंचाक्षर स्तोत्र से शुरुआत की, इसके बाद राग मालिका एवं तान आदि से निबद्ध दूसरी रचना प्रस्तुत की। दूसरी प्रस्तुति में भरतनाट्यम का बहुत महत्वपूर्ण अंग माना जाने वाला (वर्णन) में पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया। अंतिम प्रस्तुति में कीर्तनम के तहत भो-शंभू-स्वयं की प्रस्तुति में शिव के आदि-मध्य और अनंत स्वरूप का चित्रण किया।
Published on:
21 Jun 2018 10:46 pm
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