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शिप्रा के लिए पहले 100 करोड़ खर्च कर दिए, अब कर रहे यह विचार

शिप्रा को प्रवाहमान करने के लिए विशेषज्ञों ने खान के पानी को फिल्टर कर उपयोग करने की जरूरत बताई, स्टॉप डैम बनाने का प्रस्ताव भी दिया

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उज्जैन. शिप्रा को प्रवाहमान बनाने के लिए प्रतिदिन १ हजार ७३० लाख लीटर (२ क्यूमैक्स) पानी की जरूरत है। इसके विपरीत खान में वेस्टेज के रूप में २ हजार ५२० लाख लीटर पानी रहता है। एेसे में अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि यदि खान गंदे पानी को ट्रीट कर शिप्रा में छोड़ा जाए ता नदी में पानी का प्रवाह बढ़ सकता है।
शिप्रा शुद्धिकरण के लिए करीब १०० करोड़ रुपए की लागत से खान डायवर्सन प्रोजेक्ट लागू किया गया, मसलन खान को शिप्रा में मिलने से रोका गया। अब शिप्रा को प्रवाहमान बनाने के लिए खान का ही उपयोग करने पर विचार शुरू हो गया है। विशषज्ञों का मानना है कि खान नदी, शिप्रा में पानी बढ़ाने का सोर्स थी, इसलिए उसका उपयोग होना चाहिए। हालांकि इस प्रस्ताव से विरोधाभास पैदा हो गया है, वहीं सौ करोड़ रुपए के डायवर्सन प्रोजेक्ट की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लग गए हैं।
६ महीने सर्वे के बाद रिपोर्ट प्रस्तुत
नमामी देवी कार्यक्रम में शिप्रा शुद्धिकरण को भी जोड़ा है। भारत सरकार गंगा संरक्षण एवं जल संरक्षण मंत्रालय व राज्य सरकार के आदेश पर शिप्रा शुद्धिकरण करने और प्रवाहमान बनाने के लिए विशेषज्ञ अध्ययन दल ने प्रतिवदेन प्रस्तुत किया है। करीब ६ महीने सर्वे करने के बाद दल द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में शिप्रा शुद्ध व प्रवाहमान बनाने के लिए १२ बिंदुओं का उल्लेख किया है। इसमें शिप्रा में मिलने वाले नदी नालों पर जल शुद्धिकरण संयत्र स्थापित करने की जरूरत बताई है।
शिप्रा के लिए यह कार्ययोजना
- शिप्रा जल ग्रहण क्षेत्र स्थित सभी १२८ जलावर्धन संरचनाओं का सुधार, नवरूपांकन व पुनर्जीवन।
- शिप्रा जल ग्रहण क्षेत्र में करीब ६०० लाख घन मीटर जीवित व उपयोगी जल क्षमता वाली नवीन जल संरचनाओं का निर्माण ताकि वर्ष भर २ क्यूमैकस पानी नदी में प्रवाहित रह सके।
- शिप्रा जल ग्रहण क्षेत्र के प्रत्येक गाव में जल भंडरण के लिए उपयुक्तता परीक्षण कर कम से कम एक जलावरण संरचना का निर्माण।
- भूसंरक्षण रोनके वाले व कम जल का उपयोग कर वद्धि करने वाले पौधो का रोपण
- शिप्रा जल ग्रहण क्ष्ज्ञेत्र में टपक, सिंचाई, फव्वारा सिंचाई आदि से न्यूनतम जल का उपयोग हो, किसानों को प्रेरणा व सहयोग देना।
-भूजल संवर्धन के लिए गेबियन, डाइक, परकोलेशन टैंक आदि संरचनाओं का निर्माण।
- शहर के भवनों पर वाटर हॉर्वेस्टिंग सिस्टम लगाना।
-सभी स्थानीय शासन निकायों द्वारा आवश्यक स्थानों पर शिप्रा में मिलने वाले नदी नालों पर जल शुद्धिकरण संयत्र स्थापित करना।
- प्रदूषित जल निर्वाहित करने वाले उद्योगों में एसटीपी संयत्र लगवाना।
- जल कुंभी व काई बाहर निकालकर उसकी जैविक खाद तैयार कर किसानों को देना।
- नदी की तली में जमा अनावश्यक गाद, हटाकर उसे समुचित स्थानों या खेतों में फैलाया जाए।
- नदी में मछलियों व अन्य एेसे जल चर जीवों को विकसित किया जाना जो प्रदूषित जल में मिश्रित सामग्री व प्रदूषित जल का भक्षण करते हैं।
- शिप्रा नदी में मत्स्याखेट का पूरी तरह प्रतिबंध।
- उपरोक्त सभी आधारभूत सरंचनाओं के दस वर्ष तक संधारण की व्यवस्था करना।

एक्सपर्ट व्यू
पानी इम्पोर्ट और गंदगी एक्सपोर्ट नहीं कर सकते
शिप्रा नदी में पानी का मुख्य सोर्स बारिश है। नदी को प्रवाहमान बनाने के लिए सबसे पहले जरूरी है बारिश के बहते पानी की गति को धीमा करना। पानी जितनी धीमी गति से बहेगा, जमीन में उतना ही उतरेगा। इससे नदी में पानी की मात्रा बढ़ती है। इसके लिए नदी के दोनों और पेड़-पौधे लगाने की आवश्यकता है। दूसरी आवश्यकता सीवरेज को ट्रीट करने की है। जहां सीवरेज बन रहा है उसे वही ट्रीट किया जाए ताकि पानी साफ होकर आगे बहे और जिस क्षेत्र से बह रहा है, वहां के लोगों को उसका लाभ मिले। इसके लिए विकेंद्रीकृत ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाना चाहिए। इंदौर में विभिन्न प्रमुख नालों पर यह प्लांट लगना चाहिए ताकि वहां भी साफ पानी बहता नजर आए। तीसरी जरूरत नदी के साथ बड़े नालों पर भी छोटे-बड़े स्टॉप डैम बनाने की है। यह पानी की गति को कम करने का काम करेगा और भूजल स्तर बढ़ाएगा। इंदौर में प्रतिदिन ३६०० लाख लीटर पानी नर्मदा का आता है। इसमें से करीब ७० प्रतिशत पानी वेस्ट होता है, यानी प्रतिदिन २५०० लाख लीटर से अधिक। सीवरेज का रूप लेने वाले इस पानी का ट्रीटमेंट कर उपयोगा होना चाहिए। स्मार्ट सिटी वही है जहां पानी साफ है। क्योंकि पानी को इम्पोर्ट नहीं किया जा सकता और गंदगी को एक्सपोर्ट नहीं कर सकते।
- प्रो. विनोद तारे, आईआईटी कानपुर व एडवाइजरी हैड ऑफ नमागी गंगे कार्यक्रम