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उज्जैन. गर्मी की छुट्टियों में यदि उज्जैन आने का प्रोग्राम बन रहा है, तो यहां बारह ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग श्रीमहाकालेश्वर के अलावा 84 महादेव, 64 योगिनी, 56 भैरव, षड्विनायक, 51 शक्तिपीठों में से एक हरसिद्धि, श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली सांदीपनि आश्रम, महाकवि कालिदास के महाकाव्य की रचना का स्थल, कालियादेह महल, उत्तर वाहिनी पतित पावनी मां शिप्रा, तांत्रिकों के लिए विशेष सिद्ध क्षेत्र ओखरेश्वर शमशान, आताल-पाताल और कालभैरव, चिंता दूर करने वाले चिंतामण गणेश, गढ़कालिका, भर्तृहरि गुफा, पीर मत्स्येंद्रनाथ की समाधि, गोमती कुंड, सोम कुंड, रूद्रसागर, सप्त सागर, कोटितीर्थ कुंड, सती माता का मंदिर, स्याही माता का मंदिर, त्रिजटा देवी का मंदिर, भगवान महावीर की तप:स्थली।
किस-किसने किया यहां शासन
रामायण और महाभारत के बाद इस नगर का इतिहास बुद्धकाल में राजा चंडप्रद्योत से आरंभ होता है। राजा विक्रमादित्य की नगरी, शकों का चार वर्ष शासनकाल रहा, महाराजा शुद्धोदन के पुत्र गौतम बुद्ध के समय में उज्जयिनी में चंडप्रद्योत का शासन था। चौथी शताब्दि में चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों को पराजित कर मालवा पर अधिकार कर लिया। गुप्तकाल में उज्जयिनी मालवा की राजधानी थी। गुप्त शासन के पतन के बाद कुछ समय तक मालवा पर उत्तर गुप्तों का शासन रहा। उसके बाद स्थानेश्वर के वर्धन राजाओं ने अधिकार कर लिया था। हर्षवर्धन के बाद मालवा पर अधिकार के लिए प्रतिहार तथा दक्षिण के राष्ट्रकूटों में संघर्ष रहा। प्रतिहारों के पतन के बाद उनके एक सामंत सीयक ने मालवा में परमारों की सत्ता प्रारंभ की। इस वंश ने मालवा पर 500 वर्ष तक शासन किया। इसके बाद वाक्पतिराज मुंज ने मालवा पर शासन किया। उसने अपनी राजधानी उज्जयिनी से हटाकर धार नगरी चुनी थी। मुंज के बाद उसका छोटा भाई सिंधुराज गद्दी पर बैठा। इसके बाद शासक भोज ने 40 वर्ष तक मालवा पर शासन किया। राजा विक्रमादित्य के बाद भारत का अंतिम प्रसिद्ध राजा भोज ही हुआ। भोज के पश्चात इसी वंश के राजा उदयादित्य ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
बहुत खास है उज्जयिनी का इतिहास
मुगलकाल में अकबर दो बार उज्जयिनी आया था। उसका पुत्र जहांगीर भी कालियादेह महल में ठहरता था। नाव में बैठकर वह दो बार प्रसिद्ध संत जदरूप से मिलने गया था। उसका वर्णन उसने तुजुके जहांगीर में किया है। वे संत शिप्रा के पास एक तंग गुफा में रहते थे। वह गुफा कहां है, इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। संभवत: यह वही गुफा है, जिसे आजकल कालभैरव के पास पातालभैरवी के नाम से जाना जाता है। अंबर के राजा मानसिंह ने 1719 में वेधशाला बनवाई थी, जिसका जीर्णोद्धार 1923 ई. में ग्वालियर के महाराजा माधवराव शिंदे ने करवाया था। औरंगजेब मराठों से परेशान था, इसलिए धार्मिक केंद्र उज्जयिनी को प्रभावित करने के लिए महाकाल के पंडों को जजिया कर से मुक्त कर दिया था। उसकी सनद महाकाल में नंदा दीप प्रज्जवलन हेतु धृत की व्यवस्था के लिए की थी।
अल्तमश ने मारी थी महाकाल को तलवार
मुगलकाल के अंत में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया। मालवा को सिंधिया, होलकर तथा पंवारों ने बांट लिया। उज्जयिनी, मंदसौर और भेलसा राणौजी सिंधिया को मिले। अल्तमश द्वारा महाकाल को मारी गई तलवार और मंदिर ध्वस्त करने के बाद राणौजी सिंधिया के दीवान रामचंद्र बाबा शेणवी ने मंदिर का जीर्णोद्धार कर ज्योतिर्लिंग की पुन: प्राण प्रतिष्ठा करवाई थी। उन्होंने रामघाट और नृसिंह घाट का भी निर्माण करवाया। चौरासी महादेव की स्थापना भी उन्हीं के समय हुई। सिंहस्थ मेले की राजकीय व्यवस्था भी इसी समय प्रारंभ हुई थी। महादजी सिंधिया के समय गंगाघाट व अंकपात के मंदिरों का निर्माण हुआ। दौलतराव सिंधिया ने अपनी राजधानी उज्जैन को हटाकर ग्वालियर कर दिया। उनकी रानी बायजा बाई ने गोपाल मंदिर का निर्माण करवाया।
अनेक नाम थे उज्जयिनी के
उज्जयिनी के नाम युग परिवर्तन के साथ बदलते रहे। सब प्राणियों की रक्षा करने के अर्थ ने इसका नाम अवंतिका रखा गया। स्कंद पुराण के अनुसार अवंतिका खंड का उल्लेख मिलता है। यहां ब्रह्मा द्वारा स्थापित कुश आसन पर विराजमान होकर विष्णु ने राज्य शासन विधान की रचना की थी, इसलिए इसे कुशस्थली कहा गया। देव-दानवों ने समुद्र मंथन किया था। उसमें उन्हें चौदह रत्न प्राप्त हुए, जिनके लिए वे झगडऩे लगे। रक्षा की दृष्टि से नारदजी ने लक्ष्मी को महाकाल वन में भिजवा दिया। लक्ष्मी ने यहां स्थाई रूप से निवास किया। इसे पद्मावती नाम दिया गया।
Published on:
19 Apr 2019 11:01 am
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