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उज्जैन. मप्र शासन द्वारा हाल ही में खेल पुरस्कारों की घोषणा की गई है। मलखंभ के लिए तरुणा चावरे को विश्वामित्र अवॉर्ड और इसी खेल में खिलाड़ी के तौर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले चंद्रशेखर चौहान को प्रभाष जोशी सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है। दोनों ही खिलाड़ी उज्जैन से जुड़े और काफी संघर्षों के बाद इस स्थान तक पहुंचे हैं। दोनों खिलाडि़यों ने पत्रिका से बयां की अपनी संघर्ष की कहानी-
विश्वामित्र अवॉर्ड प्राप्त करने वाली तरुणा चावरे जिन्होंने १८ वर्ष मलखंभ को दिए हैं और कम उम्र में ही अवॉर्ड प्राप्त कर रही है। तरुणा का कहना है वर्ष १९९९ में उन्होंने एक खिलाड़ी के तौर पर शुरुआत की थी। जब वे इस खेल से जुड़ी थी तो घर के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं थे। एेसे में कई बार वे पैदल अप्राजी व्यायामशाला तक पहुंची। वर्ष २००४ में वे अप्राजी व्यायामशाला से लोकमान्य तिलक संस्थान पहुंची। उस दौर में वे साइकिल से सफर तय करती थी और आज भी कर रही है। उन्हें नहीं पता था कि साइकिल यह सफर उन्हें एक बड़े अवॉर्ड तक ले जाएगा।
प्रशिक्षण के तौर पर कार्य प्रारंभ
वर्ष २००४ में ही उन्होंने एक खिलाड़ी होने के साथ एक प्रशिक्षक के तौर पर कार्य प्रारंभ किया था। उन्होंने बताया कि इस खेल के दौरान उन्होंने काफी मेहनत की है। इस दौरान उन्हें कई चोटों का भी सामना करना पड़ा है। इसके साथ ही परिवार और उनके प्रशिक्षक योगेश मालवीय ने उनका सहयोग किया और आज वे इस मुकाम तक पहुंची है। यह अवॉर्ड उज्जैन, उनके संस्थान व सभी सहयोगियों को समर्पित है।
जुनून था कुछ करके दिखाना है
स्व. प्रभाष जोशी पुरस्कार के लिए नामित हुए चंद्रशेखर चौहान वर्ष २०१४ में विक्रम अवॉर्ड भी प्राप्त कर चुके हैं। कम उम्र में ही दो पुरस्कार प्राप्त करने के बाद उनका कहना है कि वे काफी खुश हैं। वर्ष २००३ में इस खेल से जुडऩे के बाद वे लगातार इस खेल में अभ्यास करते रहे हैं। शुरुआत में काफी परेशानी भी आई, परंतु उनके प्रशिक्षक योगेश मालवीय ने हमेशा हौसला बढ़ाया। वर्तमान में चंद्रशेखर एमआईटी से बीई मैकेनिकल की पढ़ाई के साथ इंदौर सेल्स टैक्स विभाग में कार्य कर रहे हैं। इंदौर से प्रतिदिन अप-डाउन के साथ अभ्यास के लिए भी आते हैं।
मेहनत रंग लाई
तरुणा और चंद्रशेखर के प्रशिक्षक योगेश मालवीय का कहना है कि दोनों ने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी मेहनत की है और उसका परिणाम है कि उन्हें उनकी सफलता का पुरस्कार इस रूप में प्राप्त हुआ है। तरुणा साइकिल से पहले भी आती थी और आज भी आती है। एक प्रशिक्षक होने के बाद भी वह उतनी ही लगन से अभ्यास करती है, जितनी लगन से पूर्व में करती थी। वहीं चंद्रशेखर का इस खेल के प्रति जुनून एेसा रहा कि घर में कोई त्योहार हो या और अवसर पर उसने कभी छुट्टी नहीं की थी और यह मेहनत पहचान दिला रही है।
Published on:
01 Nov 2017 06:32 pm
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