
Vikrmaditya
उज्जैन. नवसंवत्सर एवं चैत्र नवरात्र का शुभारंभ 8 अपै्रल को सौम्य नवसंवत्सर के रूप में हुआ। नया संवत प्रारंभ करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य ने परंपरानुसार अपने राज्य की प्रजा के सभी बकाया करों को माफ कर दिया और राज्यकोष से धन देकर दीन-दु:खियों को साहूकारों के कर्ज से मुक्त किया था। इस दिन संवत की शुरुआत मानी जाती है।
सृष्टि का निर्माण
महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की तमाम कालगणना, परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए 'विक्रम संवतÓ का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, तिथि प्रतिपदा से इसलिए किया क्योंकि पुराणों के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था।
सूर्य मेष राशि में करता है प्रवेश
संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इसी दिन अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में मनाया जाता है। वसंत ऋतु में आने वाले 'नवरात्रÓ का प्रारंभ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है।
विक्रम संवत के बारह महीने
संवत् के 12 महीने चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्ग शीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन। दो मास मिला कर ही एक ऋतु बनती है।
संवत् पर मतांतर
विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् की स्थापना की। इसको लेकर भी विद्वान एक मत नहीं है। वैसे पूर्व के तथ्य और अनेक शोध ने विक्रम संवत् को पूर्ण रूप से मान्यता प्रदान कर दी है। इसके बाद भी अनेक विद्वानों का कथन है कि 57 ई.पू. के लेखों पर संवत् का प्रयोग अवश्य हुआ है,पर संवत् नाम विक्रम नहीं था। संवत् की स्थापना तो ई.पू. 57 में हुई, वैसे सबसे पहले 794 के लेख पर विक्रमादित्य का ही नाम है। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि संवत् तो ई.पू. 57 में शुरू किया गया। इसका नाम मालवागण स्थिति और कृत-संवत् था, लेकिन मालवागण की पूर्ण स्थापना होने से उसी संवत् का नाम मालवा और प्रर्वतक विक्रमादित्य होने से वही संवत् विक्रम नाम से विख्यात हुआ।
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