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विश्व पृथ्वी दिवस : धरती पर प्रदूषण का बोझ…

हम विश्व पृथ्वी दिवस को मनाने जा रहे हैं। इस वर्ष के आयोजन की थीम इन्वेस्ट इन अवर प्लेनेट है।

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World Earth Day: The burden of pollution on the earth

हम विश्व पृथ्वी दिवस को मनाने जा रहे हैं। इस वर्ष के आयोजन की थीम इन्वेस्ट इन अवर प्लेनेट है।

उज्जैन. नेशनल अवार्ड प्राप्त विज्ञान प्रसारक सारिका घारू ने बताया कि पृथ्वी पर सभी जीवों को प्राणवायु एवं भोजन देने वाले वृक्षों की संख्या एवं उनका क्षेत्रफल संकुचित होता जा रहा है। मनुष्य की सुविधाभागी प्रवृत्ति का बढ़ता जाना एवं पृथ्वी को वापस लौटाने के प्रति जिम्मेदारी का भाव न होना ही इसका मुख्य कारण है।

सारिका ने बताया कि आधुनिकता की इस दौड़ में हमारी अनेक दैनिक गतिविधियां प्रकृति का शोषण करने वाली होती जा रही हैं। पौधारोपण एक औपचारिक कार्यकम की तरह होता है जिसमे पौधारोपण की जिम्मेदारी को पौधारोपण के कुछ पल बाद ही भुला दिया जाता है। पृथ्वी के सीमित क्षेत्रफल में से वृक्षों के नगर को समाप्त कर शहर का चौतरफा विस्तार गुणित रूप से होता जा रहा है। हर साल इस धरती पर 7 से 8 करोड़ की बढ़ती जनसंख्या की आधुनिक अवश्यकताये धरती के प्राकृतिक संसाधन के शोषण के द्वारा ही पूरी की जा रही हैं। आमतौर पर किसी को इन सुविधाओं के पीछे छिपे पर्यावरणीय नुकसान की याद ही नहीं आती है।

धरती को बचाने के उपायो में वृक्षारोपण ,पॉलीथीन की चर्चा तो किसी रटे रटाये मंत्र की तरह की जाती है लेकिन उन छोटे कारणों पर ध्यान नहीं दिया जाता है जो वैज्ञानिक जागरूकता के अभाव में धरती पर प्रदूषण का बोझ बढ़ाते हैं। सारिका ने बताया कि अवैज्ञानिक रूप से बने स्पीड ब्रेकर न केवल वाहन में बैठे लोगों को मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक रूप से नकारात्मक असर डालते हैं इसके साथ ही वाहन के ईधन की अतिरिक्त मात्रा भी खर्च होता हैं। अतिरिक्त ईधन के जलने से उत्पन्न होने वाला वायु प्रदूषण भी बढ़ता जाता है। वाहन की टूटफूट भी बढ़ती जाती है। किसी व्यस्त मार्ग पर दिन भर में निकलने वाले सैकड़ों वाहन किसी एक अवैज्ञानिक स्पीडब्रेकर के कारण धरती पर प्रदूषण का बोझ बढ़ाते जाते हैं। इसके अलावा सड़क के गड्ढे भी वाहन और आपको शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचाते वो हवा में ग्रीन हाउस गैसों को छोड़ कर धरती को और गर्म करने का कारण बनते जाते हैं।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले छिपे हुये एक अन्य कारण को देखें तो वर्तमान में किसी पार्टी, होटलों तथा घरों में भी भोजन स्थल पर टिशुपेपर का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। अवश्यकता से अधिक उपयोग की आदत के कारण टिशुपेपर होल्डर से कुछ ही पल में सारे नेपकीन डस्टबिन में जा चुके होते हैं। अनुमान के अनुसार एक बड़े देवदार के पेड़ से लगभग 45 किग्रा पेपर तैयार होता है। इसमें लगने वाला पानी तथा बिजली अलग है।

सारिका ने अपील की कि अब जब भी आप जब किसी टिशु पेपर को हाथ में लें तो उसके पीछे कटे पेड़ की कल्पना करें। कोविड के विगत दो लॉक डाउन के बाद जब हम बाकी पर्व दुगने उत्साह से मना रहे हैं तो वर्ल्ड अर्थ डे की थीम इन्वेस्ट इन अवर प्लेनेट के लिये अपने नजरिये को आज ही बदलना होगा। सौरमंडल की जीवों के साथ एकमात्र ग्रह हमारी धरती को बचाये रखने के लिये हमारे आज के हर एक कदम इस पर आश्रित जीवन की आयु को निश्चित करेंगे।

क्यो मनाया जाता है वर्ल्ड अर्थ डे

पृृथ्वी पर अस्तित्व के प्रति सम्मान व्यक्त करने, उसे बचाने और मिट्टी ,वायु और पानी के प्रदूषण पर बढ़ती चिंता को सबके सामने लाने इसका आयोजन किया जाता है। अमेरिकी सीनेटर गेलार्ड नेल्सन ने 1969 में इसे मनाने की घोषणा की थी और इसे 22 अप्रैल 1970 को पहली बार मनाया गया । वर्तमान में यह विश्व के 193 से अधिक देशो में मनाया जा रहा है।