
One thousand years old history of Mother Birasani, statue of Kalchuri period
बिरसिंहपुर पाली. नगर मे बिराजी मां बिरासनी अपने अलौकिक स्वरूप और तेज के लिये जानी जाती हैं। उनके दरबार मे मन शांति और विश्वास से भर उठता है। जो व्यक्ति एक बार भी मां के दर्शन प्राप्त कर लेता है, वह हमेशा के लिये स्वयं को उनके चरणों मे समर्पित कर देता है। ऐसी मान्यता है किसैकड़ों वर्ष पूर्व बिरासिनी माता ने नगर के धौकल नामक एक व्यक्ति को सपने मे आकर कहा कि उनकी मूर्ति एक खेत में है। जिसके बाद धौकल ने प्रतिमा को खोद निकाला और छोटी सी मढिया में उन्हे स्थापित कर दिया। बाद में नगर के राजा बीरसिंह ने एक मंदिर का निर्माण करा कर माता की स्थापना की। 23 नवम्बर 1989 को जगतगुरु शंकराचार्य शारदा पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती के द्वारा बिरासिनी मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य प्रारंभ हुआ।
स्थानीय नागरिकों, कालरी प्रबंधन और दानदाताओं के सहयोग से लगभग सत्ताईस लाख रुपए में माता का भव्य मंदिर बन कर तैयार हुआ। मंदिर का वास्तुचित्र वास्तुकार विनायक हरिदास एनबीसीसी नई दिल्ली द्वारा निशुल्क प्रदान किया गया। बिरासिनी मंदिर का लोकार्पण 22 अप्रैल 1999 को जगतगुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के शुभाशीष से संपन्न हुआ। स्वर्ण आभूषणों से होता है मां का भव्य श्रृंगार शारदेय नवरात्र पर्व की अष्टमी तिथि पर बिरासिनी के दरबार मे अठमाईन चढा कर माता की पूजा अर्चना की जाती है।
कल्चुरी कालीन है प्रतिमा
बिरासिनी मंदिर में बिराजी आदिशक्ति मां बिरासिनी की प्रतिमा कल्चुरी कालीन है। जानकार मानते हैं कि इसका निर्माण 10वीं सदी मे कराया गया था। काले पत्थर से निर्मित भव्य मूर्ति देश भर मे महाकाली की उन गिनी चुनी प्रतिमाओं मे से एक है जिसमे माता की जिव्हा बाहर नहीं है। मंदिर के गर्भ गृह मे माता के पास ही भगवान हरिहर विराजमान हैं जो आधे भगवान शिव और आधे भगवान विष्णु के रूप हैं । मंदिर के गर्भ गृह के चारो तरफ अन्य देवी, देवताओं की प्रतिमायें स्थापित हैं। मंदिर परिसर में राधा, कृष्ण, मरही माता, भगवान् जगन्नाथ और शनिदेव के छोटे-छोटे मंदिर हैं। जहां प्रवेश करते ही हृदय भक्ति भाव से ओतप्रोत हो उठता है।
Published on:
13 Oct 2021 11:21 pm
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