
The carving here meets the Virat temple, the temple before the Bandhav kings
उमरिया. चारो तरफ हरे-भरे जंगलो के बीच स्थित मां ज्वालामुखी की मंदिर अपनी प्राचीनता का स्वयं प्रमाण देता है। मंदिर में स्थापित मां ज्वालामुखी की अति प्राचीन प्रतिमा भव्य स्वरूप में है। वहीं मंदिर की दीवारों में की गई चित्रकारी व कलाकृतियां शहडोल के विराट मंदिर से मिलती जुलती है। जिससे इसके अति प्राचीन होने की भी प्रमाणिकता सिद्ध होती है। हम बात कर रहे हैं बांधवगढ़ नेशनल पार्क के मानपुर रेंज के सिगुड़ी मोड़ और सरमनिया के बीच ग्राम रोहनिया स्थित मां ज्वालामुखी मंदिर की। मंदिर की निर्माण शैली व यहां स्थिति कलाकृतियों व चित्रकारी को देखकर यह कयास लगाए जा रहे हैं के उक्त मंदिर का निर्माण बांधवगढ़ राजाओं के शासन के पूर्व कराया गया था। इस मंदिर के दक्षिण तरफ बांधवगढ़ शेष सइया से निकलने वाली पवित्र चरण गंगा बहती है। जिसमें बारहों मास निर्मल जल कल-कल कर बहता रहता है। जंगल के बीच स्थित इस मंदिर के बगल से कल-कल कर बहने वाली यह नदी इस स्थान को और भी मनमोहक बनाती है।
मंदिर में कराए लगातार नए निर्माण
बुजुर्गों की माने तो पहले इस स्थान पर सिर्फ ज्वालामुखी माता का मंदिर स्थापित है। इसके बाद धीरे-धीरे लोगों की आस्था बढ़ती गई और काफी तादाद में श्रद्धालुओं का आना-जाना होने लगा। जिसके साथ ही इस क्षेत्र को और भी विकसित करने के प्रयास तेज हो गए। मंदिर प्रांगण में लगभग 25 फिट की ऊंची श्री हनुमान जी की विसाल मूर्ती, तकरीबन 20 फिट उंची शिव ज्योतिर्लिंग युक्त शिव गौरी मंदिर, गणेश मंदिर के साथ कई मंदिर स्थित हैं। जहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने बनाया था आश्रम
बताया जा रहा है कि मंदिर के ठीक पीछे एक आश्रम भी स्थापित है। इस आश्रम का संचालन क्षेत्रीय स्वतंत्रता सेनानी स्व. छोटेलाल पटेल द्वारा संचालित किया गया। जहां अभी भी क्षेत्रीय गरीब बच्चे शिक्षा ग्रहण करने आते हैं। जहां उन्हे आश्रम जैसे सारी सुविधाओं के साथ शिक्षा भी दी जाती है।
Published on:
19 Feb 2021 06:06 pm
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