
सुपेबेड़ा के किडनी पीडि़त को इलाज कराने के लिए बेचनी पड़ी जमीन
रायपुर. गरियाबंद जिले के सुपेबेड़ा व आसपास के किडनी पीडि़त मरीजों को स्वास्थ्य विभाग सारी चिकित्सकीय सुविधाएं निशुल्क उपलब्ध कराने का दावा कर रहा है लेकिन सच्चाई यह है कि रायपुर आने के लिए मरीजों को अपनी जेब से खर्च करना पड़ रहा है। राजधानी के दाऊ कल्याणसिंह सुपरस्पेशलिटी (डीकेएस) अस्पताल में किडनी का इलाज करा रहे गांव के उपसरपंच दुर्योधन पुरैना का कहना है कि वह ६ हजार रुपए खर्च कर निजी वाहन से रायपुर इलाज के लिए पहुंचे हैं। स्वास्थ्य विभाग लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है लेकिन एक स्पेशलिस्ट डॉक्टर को रखने में नाकाम है। यदि गरियाबंद में डायलिसिस की सुविधा हो जाती तो ग्रामीणों को काफी राहत मिलती। उनके जैसे गांव व आसपास क्षेत्रों में दर्जनों मरीज हैं जो रायपुर आना चाहते हैं लेकिन आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से इलाज नहीं करा पा रहे हैं। उपसरपंच के परिजनों ने बताया कि बीमारी का इलाज कराने में जमीन बिक गई। १० से १२ लाख रुपए खर्च हो गए हैं लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई। अब तो दो वक्त की रोटी के लिए भी मशक्कत करनी पड़ रही है।
दो दिन से नहीं मिला भोजन
नम आंखों से दुर्योधन पुरैना ने बताया कि डीकेएस अस्पताल में ५ दिनों से भर्ती हैं। उनको निशुल्क इलाज व खाना मिल रहा है लेकिन परिजनों के लिए कोई व्यवस्था नहीं होने से काफी परेशानी हो रही है। दो दिन से उनके परिजन भूखे हैं। इतने पैसे भी नहीं है कि वह होटल या दुकान में जाकर खाना खा सकें। गरियाबंद में यदि डायलिसिस की सुविधा रहती तो यह परेशानी नहीं होती। दुर्योधन की देखरेख कर रही महिला ने बताया कि अस्पताल में दिन गुजर जाता है, लेकिन रात अस्पताल के बाहर परिसर में गुजरता है।
छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारिक सिंह ने कहा कि देवभोग में एक मशीन लगी हुई है लेकिन विशेषज्ञ की कमी की वजह से चालू नहीं किया गया है। हम जल्द ही देवभोग या गरियाबंद में डायलिसिस की सुविधा शुरू करने का प्रयास कर रहे हैं।
गरियाबंद सीएमएचओ डॉ. नवरत्न ने बताया कि ग्रामीण को सरकारी वाहन से रायपुर भेजा गया था। बीच रास्ते में तो उनको नहीं उतरा जा सकता। वह झूठ बोल रहे हैं। वह ऐसा क्यों कह रहे हैं, बात करता हूं।
Published on:
18 Jan 2020 01:00 am
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