मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोयफेसर डा. आरके वर्मा के शोध को भारत सरकार ने पेटेंट कर दिया है। शोध के परिणाम को कापीराइट का अधिकार दे दिया है। डा. वर्मा ने अपने शोध छात्रों के सहयोग से कालीन के अपशिष्ट से हल्के वजन का ऐसा पालीमर नैनो कंपोजिट मैटीरियल तैयार किया है, जिससे ताप व ध्वनिरोधी शीट्स और दीवारों पर लगाई जाने वाली टाइल्स बनाई जा सकती हैैं।
अब कालीन अपशिष्टों से हो रहे प्रदूषण को रोका जा सकेगा। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय गोरखपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोयफेसर डा. आरके वर्मा के शोध को भारत सरकार ने पेटेंट कर दिया है। शोध के परिणाम को कापीराइट का अधिकार दे दिया है। डा. वर्मा ने अपने शोध छात्रों के सहयोग से कालीन के अपशिष्ट से हल्के वजन का ऐसा पालीमर नैनो कंपोजिट मैटीरियल तैयार किया है, जिससे ताप व ध्वनिरोधी शीट्स और दीवारों पर लगाई जाने वाली टाइल्स बनाई जा सकती हैैं। उन्होंने प्रयोग के तौर पर ऐसी कई टाइल्स बनाई भी है।
शोध को मिली अंतरराष्ट्रीय मान्यता-
डा. वर्मा के शोध पर सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एंड टेक्नालाजी लखनऊ और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) रुड़की पहले ही मुहर लगा चुका है। नीदरलैंड के रिसर्च जर्नल 'एल्सवीयर' के साथ ही चीन के रिसर्च जर्नल में भी इसके प्रकाशन से शोध को अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिली है।
डा. वर्मा ने बताया कि गोरखपुर, वाराणसी और मिर्जापुर मंडल में कालीन के अपशिष्ट निस्तारण में आ रही समस्या और उससे हो रहे पर्यावरण प्रदूषण ने उन्हें इस विषय पर शोध के लिए प्रेरित किया। समस्या के निदान के लिए उन्होंने जैसे ही भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के हस्तशिल्प विभाग को शोध प्रस्ताव भेजा, उसे तत्काल मंजूर कर लिया गया और धनराशि भी आवंटित कर दी गई। उस धनराशि की मदद से ही वह अपने शोध कार्य को एक निर्णायक मुकाम तक पहुंचा चुके है। डा. वर्मा की इस सफलता पर विश्वविद्यालय परिसर में खुशी का माहौल है। कुलपति प्रो. जेपी पांडेय और शिक्षकों ने उन्हें बधाई दी है ।