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जब तवायफों के घुंघरूओं से हार गई थी अंग्रेजी हुकुमत

-बनारस की तवायफो ने कोठों को बना  लिया  था क्रान्ति  का केंद्र ,नृत्य संगीत बन गया था हथियार 

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Awesh Tiwary

Aug 14, 2016

an unwritten story

an unwritten story

-आवेश तिवारी
वाराणसी. वारेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में जब अंग्रेज सेना ने बनारस में प्रवेश किया उस वक्त सुबह के 5 बजे थे इधर घोड़ों की टाप उधर बनारस की दालमंडी में दुलारी बाई के घुंघरुओं की छम छम।लेकिन जैसे ही दुलारी ने अंग्रेजों के आने की खबर सुनी वो घुंघरू फेंक नन्हकू सिंह को ढूँढने गलियों में दौड़ पड़ी।जैसे ही नन्हकू सिंह से मुलाक़ात हुई दुलारी चिल्लाते हुए बोली "तिलंगों ने राजा साहब को घेर लिया है ,महारानी पन्ना भी साथ में हैं कोई कहता है उन्हें पकड़कर कलकत्ते भेजेंगे"।"क्या महारानी को भी "?दुलारी की बात सुनते ही नन्हकू सिंह की आँखें लाल हो जाती हैं और भुजाएं फड़कने लगती है ,वो दुलारी को धन्यवाद कहता है और शिवाला घाट की ओर दौड़ पड़ता है जहाँ कुछ समय बाद उसके पराक्रम से चारों तरफ केवल अंग्रेजों के कटे सिर दिखाई पड़ते हैं। यह केवल एक कहानी है 19 वी सदी के प्रारम्भ में बनारस की दालमंडी सिर्फ बाजार भर नहीं रह गई थी यहाँ के कोठों पर नृत्य -संगीत और अदब के साथ साथ क्रान्ति की सैकड़ों ऐसी कहानियाँ लिखी जा रही थी जिन्हें न तो पढ़ा जाता है न कहा जाता है।

तवायफों से डरते थे अंग्रेज

तवायफों को लेकर ब्रिटिश हुकूमत किस कदर डरी हुई थी इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1857 की क्रान्ति की योजना बनाने में कोठों की प्रमुख भूमिका थी जिनमे बनारस के दालमंडी के कोठों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। अपनी पुस्तक "द मेकिंग आफ कोलेनियल " में इतिहासकार वीणा तलवार ओल्डेनबर्ग लिखती है "यह साफ़ थी कि यह महिलायें लड़ाई करने वाली नहीं थी लेकिन उन्हें बागियों को भड़काने और उन्हें आर्थिक मदद देने की सजा मिली "।नहीं भुला जाना चाहिए कि 1857 की क्रान्ति के बाद ही देश में क्राउन कानून लागू हुआ जिसमे तवायफों को वेश्या बताते हुए इस पूरे धंधे को आपराधिक घोषित कर दिया गया।

जद्दन बाई से रसूलन बाई तक

जद्दन बाई को लेकर मशहूर अभिनेत्री नर्गिस की माँ और संजय दत्त की नानी के रूप में जानते हैं ,अपने समकालीन गायिकाओं में सबसे ज्यादा खुबसूरत जद्दन बाई के कोठे पर कई बार अंग्रेजों के छापे पड़े थे। अंग्रेजों को शक था कि जद्दन बाई क्रांतिकारियों को अपनी महफ़िल में पनाह देती हैं। कहा जाता है कि जद्दन बाई को अंग्रेजों के भारी दबाव की वजह से ही दालमंडी की गलियां छोडनी पड़ी। फुलगेंदवा न मारो मैका लगत वकरेजवा में चोट ...जैसे गीत देने वाली खुबसूरत आवाज की मल्लिका रसूलन बाई का समूचा बनारस बेहद इज्जत करता था ,वह रसूलन बाई थी जिनके रिकार्ड तैयार करने के लिए फ्रांस भेजे जाते थे। 1920-22 के आस-पास रसूलन बाई की संगीत की महफिल में आजादी की लड़ाई की रणनीति भी तैयार की जाती थी।रसूलन बाई ने गांधी जी के स्वदेशी आन्दोलन के दौरान आभूषण तक पहनना छोड़ दिया था।उन्होंने भी देशभक्ति के कई गीत गाये । आजाद भारत में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित रसूलन भाई को ब्रिटिश हुकूमत ने काफी प्रताड़ित किया था उन्होंने प्रण किया था कि देश के आजाद होने से पहले विवाह नहीं करुँगी। उन्होंने आजादी के बाद ही बनारस के एक साडी व्यवसायी से ब्याह किया।

अरे रामा नागर नैया जाला काले पनिया रे हरी

मिर्जापुर के पक्के मोहाल की सुन्दर की गई कजली आज भी बनारस और मिर्जापुर का बच्चा बच्चा गाता है" अरे रामा ,नागर नैया जाला कालेपनियाँ रे हरी "।एक वक्त बनारस के मशहूर गुंडे नागर की प्रेमिका रही सुन्दर अपने प्रेमी नागर को याद करके जिंदगी भर आजादी के तराने गाती रही। अंग्रेज सेना के छक्के छुड़ा देने वाले नागर को उस वक्त मुखबिर की सूचना पर गिरफ्तार कर लिया गया था जब वो अकेले निहत्था कतेसर की ओर जा रहा था |नागर को कालेपानी की सजा हो गई।कहा जाता है कि नागर की गिरफ्तारी के बाद सुन्दर पागल हो गई थी और दिन रात नारघाट की सीढियों पर बैठ कर वो गाती रहती थी।
सबकर नैया जाला कासी हो बिसेसर रामा
नागर नैया जाला कालेपनियाँ रे हरी
खुंटिया पे रोवे नागर ढाल तरवरिया रामा
कोनका में रोवे कडाबिनियाँ रे हरी

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