वाराणसी. वारेन हेस्टिंग्स के नेतृत्व में जब अंग्रेज सेना ने बनारस में प्रवेश किया उस वक्त सुबह के 5 बजे थे इधर घोड़ों की टाप उधर बनारस की दालमंडी में दुलारी बाई के घुंघरुओं की छम छम।लेकिन जैसे ही दुलारी ने अंग्रेजों के आने की खबर सुनी वो घुंघरू फेंक नन्हकू सिंह को ढूँढने गलियों में दौड़ पड़ी।जैसे ही नन्हकू सिंह से मुलाक़ात हुई दुलारी चिल्लाते हुए बोली "तिलंगों ने राजा साहब को घेर लिया है ,महारानी पन्ना भी साथ में हैं कोई कहता है उन्हें पकड़कर कलकत्ते भेजेंगे"।"क्या महारानी को भी "?दुलारी की बात सुनते ही नन्हकू सिंह की आँखें लाल हो जाती हैं और भुजाएं फड़कने लगती है ,वो दुलारी को धन्यवाद कहता है और शिवाला घाट की ओर दौड़ पड़ता है जहाँ कुछ समय बाद उसके पराक्रम से चारों तरफ केवल अंग्रेजों के कटे सिर दिखाई पड़ते हैं। यह केवल एक कहानी है 19 वी सदी के प्रारम्भ में बनारस की दालमंडी सिर्फ बाजार भर नहीं रह गई थी यहाँ के कोठों पर नृत्य -संगीत और अदब के साथ साथ क्रान्ति की सैकड़ों ऐसी कहानियाँ लिखी जा रही थी जिन्हें न तो पढ़ा जाता है न कहा जाता है।