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International Girl’s Day 2018- बेटी जो पिता के सपने को साकार करने आईं पुलिस में और आमजन को राहत दे बना दिया रिकार्ड

आइजीआरएस में लगातार तीसरी बार पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली पुलिस अधीक्षक बनीं।

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सीओ अंकिता सिंह

सीओ अंकिता सिंह

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी


वाराणसी. बदलते परिवेश में अब कोई भी काम जेंडर आईडेंटिटी से जुड़ा नहीं रहा। चाहे वह अंतरिक्ष में जाना हो या समाज में रह कर समाज की सेवा करना, दीन दुखियों की पीड़ा को हरना हो। कहने को समाज के बीच पुलिस को लेकर लोगों के दिलो दिमाग में हमेशा से एक नकारात्मक छवि ही रही है। किसी की न सुनना। छोटी-छोटी बातो पर रिएक्ट करना। अभी हाल ही में लखनऊ के विवेक तिवारी कांड के बाद से पुलिस की छवि कहीं ज्यादा दागदार हुई है। लेकिन इसी पुलिस में एक बेटी ने पुलिस की नौकरी को इसलिए चुना कि वह इस पेशे में रह कर लोगों की मदद कर सकें। उनकी पीड़ा सुन कर उसे दूर करा सकें। हां! इसके लिए उन्हें प्रेरित किया उनके पिता एसके सिंह ने जो खुद भी पुलिस में रहे, एक दरोगा से नौकरी शुरू की और डिप्टी एसपी से सेवानिवृत्त हुए। इस युवा व होनहार बेटी ने पुलिस में आ कर पिता के सपनों को साकार करने की ठानी और वह कर दिखाया जो अच्छे-अच्छे नहीं कर पाए।

लगातार तीसरी बार आईजीआरएस में प्रदेश में अव्वल आईं

ये बेटी और कोई नहीं बल्कि बनारस की सीओ चेतगंज अंकिता सिंह है। जिन्होंने लगातार तीसरी बार आइजीआरएस में पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान हासिल किया है। देवरिया की मूल निवासी ऐसी युवा पुलिस अधीक्षक को भला कौन न सलाम करे। इस विश्व बालिका दिवस पर पत्रिका ने अंकिता से खास बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के संपादित अंश...

प्रश्न- पुलिस में आने के पीछे क्या सोच रही?
उत्तर- पिता एसके सिंह की प्रेरणा थी। वह बराबर कहा करते थे कि दुनिया में दो ही पेशा ऐसा है जिसके माध्यम से हम समाज की सच्ची सेवा कर सकते हैं, उसमें एक डॉक्टर और दूसरा पुलिस। ऐसे में मैने पुलिस में आने का निश्चय किया। लगता है वास्तव में पिता सही थे, डॉक्टर के पास भी परेशान हाल लोग ही पहुंचते हैं और पुलिस के पास भी। जब हर जगह से हार जाते हैं तभी लोग हमारे पास आते हैं। सो अब लगता है कि पिता की सलाह सही थी।

प्रश्न- पढाई के बाद ही पुलिस में आने का निश्चय कर लिया था?
उत्तर-ऐसा नहीं है, गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास में मास्टर डिग्री लेने के बाद मैने, बिहार पीसीएस का एग्जाम दिया। 2006 में उसमें सलेक्ट भी हो गई। उसी दौरान यूपी में लोकसेवा आयोग की परीक्षा दी, उसमें भी चुनी गई और असिस्टेंट लेबर कमिश्नर के पद पर मेरी नियुक्ति भी हो गई। लेकिन तभी डीवाईएसपी की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर लिया था सलेक्ट हो गई तो पुलिस में आ गई।

प्रश्न-पहली पोस्टिंग कहां थी?
उत्तर- पहली पोस्टिंग कानपुर नगर में थी उसके बाद बनारस आ गई और सीओ चेतंज हूं। मेरे पति अखिलेश सिंह भी यहां बनारस में सीओ चेतगंज, सीओ भेलूपुर, सीओ बड़ा गांव रह चुके हैं। फिलहाल वह पावर कारपोरेशन में हैं।

प्रश्न- पुलिस को लेकर लोगों की इतनी नकारात्मक सोच को किस रूप में लेती हैं?
उत्तर- देखिये पुलिस ही है जिसका जनता से सीधा सरोकार होता है वह भी रोजाना। हर गली, हर नुक्कड़ पर पुलिस ही दिखती है। अब जो काम करेगा उसी के बार में तो सकारात्मक या नकारात्मक बात होगी। वैसे मैं ऐसा नहीं मानती कि महकमें में सभी अच्छे ही हैं। लेकिन नकारात्मकता की जहां तक बात है तो हर विभाग मे सही व गलत लोग हैं। कुछ लोग पुलिस में भी हैं।

प्रश्न-क्या वहज है पुलिस की आक्रामक प्रवृत्ति की?
उत्तर- एक तो पुलिस महकमे में अधिकारी वर्ग की काफी कमी है। सब इंस्पेक्टर के ऊपर जाइएगा तो इसमें काफी कमी है। सिपाही ज्यादा है। उन्हीं का जनता से सीधा सरोकार होता है। ऐसे में उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनसे विभाग बदनाम होता है।

प्रश्न- इसकी वजह वर्क लोड तो नहीं?
उत्तर-वर्क लोड तो है ही। स्टाफ की कमी है। बहुत दिनों से एक बात चल रही है कि जांच और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी अलग-अलग कर दी जाए लेकिन अभी तक ऐसा हो नहीं सका। ऐसे में कार्य की अधिकता तो है ही। यह बड़ा कारण है तनाव का। स्ट्रेंथ बढ़नी चाहिए।

प्रश्न- विवेक तिवारी प्रकरण के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पुलिस भर्ती प्रक्रिया की रिपोर्ट तलब किया है। कोर्ट यह जानना चाहती है कि क्या भर्ती में मानसिक परीक्षण भी होता है। क्या है प्रक्रिया ?
उत्तर- सब इंस्पेक्टर से ऊपर की भर्ती में तो फिजिकल टेस्ट के साथ साक्षात्कार भी है। साक्षात्कार के दौरान काफी कुछ मेंटल एबिलिटी का पता चल जाता है। लेकिन सिपाही की भर्ती के लिए ऐसा नहीं है। यहां भी साक्षात्कार लागू करना चाहिए, ताकि सिपाही के दिमागी संतुलन का पता चल सके। केवल शरीर से मजबूत होना ही जरूरी नहीं। बेहतर दिमागी संतुलन से और अच्छा काम हो सकता है।

प्रश्न- ये आइजीआरएस क्या है, इसमें ऐसा क्या कर दिया आपने?
उत्तर- आईजीआरएस, पुलिस की ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली है। इसके लिए 15 दिन की मियाद तय है, इसी समय सीमा में आम जन से प्राप्त शिकायतों का परीक्षण कर उनका निराकरण करना होता है। इसके लिए प्रतिउत्पन्न मति के साथ आपकी तत्परता का विशेष महत्व होता है। तरह-तरह की शिकायतें होती हैं, उन्हें समय सीमा में निस्तारित करना होता है। इसमें विभागीय लोगों का सहयोग भी मिला जिसके चलते मैने तीसरी बार प्रदेश में यह उपलब्धि हासिल की है।

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