
पंडित राजन साजन मिश्र
वाराणसी. कहा गया है कि किसी देश के बारे में जानने का सबसे बेहतर तरीका है कि वहां की संस्कृति और साहित्य का अध्ययन किया जाए। ये दोनों के माध्यम से किसी भी सभ्यता की जानकारी आसानी से हासिल की जा सकती है। ऐसे में जब भारतीय संस्कृति की बात हो तो फिर राजधानी काशी ही सर्वोच्च स्थान पर होगा। भारतीय संगीत व संस्कृति के लिए बनारस घराना यूं ही दुनिया भर में मशहूर नहीं है। ऐसे में अब इसी बनारस घराने के महान संगीतकार बंधु पंडित राजन मिश्र व साजन मिश्र ने ठाना है कि वे समूची दुनिया को अपने हुनर से बनारस घराने और भारतीय संस्कृति से रू-ब-रू कराएंगे। इसी के तहत वे शुरू करने जा रहे हैं भैरव से भैरवी तक की संगीत यात्रा। इसकी शुरूआत होगी काशी के अस्सीघाट से। यहां 18 नवंबर की शाम सजेगी संगीत की महफिल। यह जानकारी पंडित राजन-साजन मिश्र ने मीडिया को दी।
बनारस में नहीं है पर्याप्त संसाधन
एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि बनारस में तो पूरे दिन का कार्यक्रम सम्भव नहीं है। उसके लिए वैसा परिवेश और संसाधन चाहिए जो बनारस में संभव नहीं है। ऐसे में बनारस में दो ढाई घंटे का होगा। शाम छह बजे से शुरू होगा। विदेशों में जहां ये सब मिल रहा है वहां पूरे पूरे दिन का प्रोग्राम होगा। अमेरिका और लंदन में यह आयोजन हो रहा है, अमेरिका के छह- सात जगहों पर यह आयोजन होगा। वहां दोपहर के राग जैसे भीमपलासी, मुल्तानी उससे शुरू कर के फिर मारवा, शुद्ध कल्याण फिर बागेश्वरी मालकोंस फिर दरबारी आदि। भैरव से भैरवी तक एक ट्रेड मार्क बन गया है।
बनारस के अस्सी घाट पर होगा आगाज
उन्होंने बताया कि ‘भैरव से भैरवी’ तक विश्व संगीत यात्रा का आगाज काशी के प्राचीनतम अस्सी घाट पर 18 नवम्बर की शाम छह बजे होगा। रागों का श्रीगणेश प्रख्यात तबला वादक पं कुमार बोस करेंगे और पं धर्मनाथ मिश्र हारमोनियम पर संगत करेंगे। 2017 से शुरु होकर यह कार्यक्रम 2018 में पूरे साल चलेगा। उन्होंने बताया कि 18 नवम्बर को वाराणसी से इस कार्यक्रम की शुरूआत होगी। इसके बाद 17 दिसम्बर को अहमदाबाद में दूसरा पड़ाव होगा। फिर 2018 में कोलकाता,बंगलूरू, दिल्ली, गोवा, पुणे के अलावा मुंबई में यह कार्यक्रम होगा। फिर दक्षिण अमेरिका में अप्रैल-मई में इसका आयोजन होगा। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम सिंगापुर, टोरंटो, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, वाशिंगटन डीसी, शिकागो, लॉसएंजेल्स में भी होगा। साथ ही लंदन व ऑस्ट्रेलिया के कई शहरों से होते हुए समापन न्यूजीलैंड के वेलिंगटन में होगा। पदमभूषण पंडित साजन मिश्र के अनुसार पहला कार्यक्रम जर्मनी में 1992 में किया गया था। तब से वे देश की संस्कृति का प्रचार प्रसार संगीत के माध्यम से अनवरत कर रहे हैं।
दुनिया भर में मशहूर है बनारस घराना
उन्होंने बताया कि भारत पूरे विश्व में अपनी सांस्कृतिक विरासतों के लिए जाना जाता है। इसमें केवल गीत संगीत अथवा नृत्य ही नहीं खानपान और वेशभूषा की भी बड़ी समृद्ध विरासत है। इन विरासतों को संभाल रखा है इनसे जुड़े हुए कुछ विशेष घरानों ने ।इन घरानों ने पीढ़ी दर पीढ़ी इस ज्ञान का हस्तानान्तरण किया है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में बनारस घराने का नाम बहुत प्रमुखता से लिया जा सकता है। बनारस घराने के ही प्रख्यात गायक बंधु पद्मभूषण पं राजन साजन मिश्र के नेतृत्व में शीघ्र ही एक सुर यात्रा का आगा़ज़ होने वाला है जो देश ही नहीं अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर अनेक देशों से हो कर गुज़रेगी। इस सुर यात्रा का नाम है भैरव से भैरवी तक ।
भगवान शिव के मुख से निकलने वाला है पहला राग भैरव
पंडित साजन मिश्र बताते हैं कि भगवान शिव के मुख से निकलने वाला पहला राग भैरव था। तब से इसकी शुरुआत हुई। पहला राग भैरव है जबकि अंतिम राग भैरवी को माना जाता है। उन्होंने बताया कि राग भारतीय शास्त्रीय संगीत की जननी है। देवभाषा संस्कृत से ही राग शब्द का उद्भव हुआ है। राग के आभा मंडल का दायरा अत्यन्त व्यापक और गहरा है। इसके विविध रंग हैं, जो विभिन्न ऋतुओं और कालक्रम के अनुरूप श्रोताओं के मनोभावों और संवेदनाओं को प्रभावित करते हैं। प्रत्येक राग की अपनी विशिष्टता और चरित्र है। शास्त्रीय विधान के अनुसार रागों की यात्रा प्रभात काल भैरव से प्रारंभ होकर रागिनी भैरवी पर पूर्ण होती है। भैरव से भैरवी तक रागों के सांगीतिक अनुष्ठान का क्रम है, जिसे विश्व संगीत यात्रा के माध्यम से प्रस्तुत करने का अभिनव प्रयास किया जाने वाला है।
शिव और पार्वती से जुड़ा है भैरव से भैवरी राग
उन्होंने बताया कि भैरव से भैरवी तक अर्थात शिव ( भैरव ) से पार्वती ( भैरवी ) तक की इस यात्रा में शिव के अनेक रुपों जैसे शांत, गंभीर, रौद्र, वैरागी व पार्वती के अनेक रुपों जैसे श्रृंगार, चंचलता आदि पर आधारित रागों का समुच्चय होगा। इससे ये तात्पर्य लगाया जा सकता है कि राग रागिनियों के लगभग सभी रंग इस आयोजन में देखे जा सकते हैं। इस आयोजन की सबसे विशेष बात ये है कि ये आयोजन केवल एक म्युज़िकल कान्सर्ट ही नहीं बल्कि विश्व के कोने कोने में रहने वाले संगीत प्रेमियों और जिज्ञासुओं को जोड़ने की एक कड़ी है। इतना ही नहीं विश्व भर में फैले हुए वरिष्ठ संगीतज्ञों से संवाद स्थापित करने का एक अनूठा माध्यम भी है। इस आयोजन में संगीत में रुचि रखने वालों के लिए वर्कशॉप और व्याख्यान की योजना भी समाहित है।
ये है उद्देश्य
उन्होंने कहा कि भैरव से भैरवी तक शुरू करने का एक ही उद्देश्य है कि हमारे शास्त्रीय संगीत में समय के अनुसार रागों की सारणी की जो व्यवस्था है उसकी जानकारी लोगों तक पहुंचे कि सुबह का कौन राग है , दोपहर का कौन राग है, शाम का कौन राग है। बहुत लोग अभी भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की इस विशिष्टता से अनभिज्ञ हैं। सबसे पहले वर्ष 1993 – 94 में जर्मनी में हुआ था इस तरह का कार्यक्रम। इसमें तीन प्रहर का एक प्रोग्राम हुआ था एक ही जगह पर। वहां से ये कांसेप्ट यहां आया। पांच साल पहले पुणे में इस तरह के आयोजन की शुरूआत हुई थी, तब दो दिन में सात- सात घंटे चला था वह आयोजन। फिर मुंबई में संमुखानंद हाल में 14 घंटे का आयोजन हुआ। उसी की प्रेरणा से ऐसे वैश्विक सांगितिक दौरे का कार्यक्रम बनाया गया ताकि लोगों को सुबह, दोपहर ,शाम, रात तक के सभी रागों का परिचय दिया जाए। सब रागों की लोगों को एक झलक मिले और लोगों को पता चले कि हमारी सांगीतिक विरासत कितनी समृद्ध है। ऐसी व्यवस्था तो विश्व में कहीं और नहीं कि सुबह का राग अलग है दोपहर का अलग है फिर दोपहर के बाद का अलग है फिर शाम और रात का भी अलग है ।लोगों को पता चले कि हमारे संगीत में कितनी गहराई है। इसीलिए भैरव से भैरवी तक का कांसेप्ट रखा गया गया।
Published on:
17 Nov 2017 01:40 pm
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