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इन वोटरों के हाथ में है 2019 का चुनाव, तय करेंगे मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं

सपा-बसपा गठबंधन ने उड़ाई नींद, अब भाजपा की निगाह इन्हीं वोटर पर, सारी कवायद उसी के लिए।

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नरेंद्र मोदी और मतदाता

नरेंद्र मोदी और मतदाता

वाराणसी. आगामी 2019 का लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए आसान नहीं होने जा रहा है। खास तौर पर अगर यूपी की बात करें तो हालात कुछ ज्यादा ही गंभीर नजर आ रहे हैं। इसका आभास बीजेपी नेतृत्व को लग चुका है। यही वजह है कि शीर्ष नेतृत्व ने यूपी में मैराथन दौरा करना शुरू कर दिया है। खास तौर पर सपा-बसपा गठबंधन ने बीजेपी नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। वैसे भी यह तो तय है कि यूपी की 80 सीट ही निर्णायक होगी, इसमें से जिसके पाले में ज्यादा सीटें आईं वही दिल्ली के तख्त पर बैठेगे। उसी के सिर सजेगा ताज।

यूपी में सपा-बसपा गठबंधन के बाद बीजेपी का सारा जोर अति पिछड़ा और अति दलित वोटरों पर है। बीजेपी नेतृत्व भी यह मान कर चल रहा है कि दलित और यादव वोटबैंक में सेंधमारी करना आसान नहीं है। ये क्रमशः बसपा और सपा के पाले में ही जाएंगे। ऐसे में गैर यादव यानी अन्य पिछड़ा वर्ग को साधने में जुट गई है पार्टी। वैसे भी यूपी का जातीय समीकरण देखें तो यादव महज आठ प्रतिशत ही हैं और जहां तक दलित का सवाल है तो उनका प्रतिशत तकरीबन 16 के आस पास आता है। यदि प्रदेश के कुल पिछड़ों और दलितों की बात करें तो इनकी तादाद 52 फीसदी के आसपास है। ऐसे में शेष 28 से 30 फीसदी वोटरों पर ही सारा निशाना है।

यही वजह है कि बीजेपी नेतृत्व अब अपना दल के जनक सोने लाल पटेल को भी भुनाने लगा है। अभी रविवार को ही जिस तरह से मिर्जापुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटेल वोटरों को सहेजने के लिए डॉ सोनेलाल पटेल का नाम लिया और यहां तक कहा कि उनके सपने को हम सब मिल कर पूरा करेंगे। यहां बता दें कि मिर्जापुर पटेल बहुल इलाका है। इस वोट बैंक पर साझा विपक्ष की भी नजर है जिसके लिए डॉ सोनेलाल पटेल की पत्नी कृष्णा पटेल वाले अपना दल को साधने में विपक्ष जुटा है। अब तो प्रदेश अध्यक्ष पल्लवी पटेल विपक्ष की लगभग सारी सभाओं में दिखने लगी हैं। उधर गत उपचुनाव में फूलपुर सीट पर जिस तरह से बीजेपी को पराजय का सामना करना पडा उससे भी उसने बड़ा सबक लिया है क्योंकि फूलपुर भी पटेल बहुल इलाका था और बीजेपी ने एक पटेल को ही प्रत्याशी भी बनाया था। बावजूद इसके वहां उसे हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में मिर्जापुर से लेकर इलाहाबाद या यूं कहें कि वाराणसी के रोहनिया से लेकर इलाहाबाद के फूलपुर तक पटेल वोटरों को सहेजना बीजेपी की रणनीति का हिस्सा बन गया है।

वैसे भी बीजेपी के 2014 के चुनाव में मिली जीत में भी पिछड़ों को बड़ा योगदान रहा। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी इसी वोटबैंक का प्रमुख योगदान रहा है। इस जातीय समीकरण के लिहाज से ही पार्ट ने केशव प्रसाद मौर्य को सूबे की कमान सौंपी थी। लेकिन उनके डिप्टी सीएम बनने के बाद नाराज ब्राह्मण वोट बैंक को सहेजने के लिहाज से डॉ महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश की कमान सौंप दी गई। लेकिन अब फिर से एक बार नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा शुरू हो गई है। पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि डॉ पांडेय की जगह अब प्रदेश के परिवहन मंत्री परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को राज्य की कमान सौंपी जा सकती है। वह कुर्मी बिरादरी से आते हैं। बुंदेलखंड उनका इलाका है। वह पहले भी संगठन में काम कर चुके हैं। महासिचव रह चुके हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह विश्वास पात्र भी हैं। पार्टी के थिंक टैंक का मानना है कि उनके प्रदेश अध्यक्ष बनने से जहां एक पूर्वांचल के कुर्मी वोट बैंक पर कब्जा होगा वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद का वर्चस्व तोड़ने में भी वह सफल हो सकते हैं। फिर डॉ पांडेय को कहीं के राजभवन का रास्ता दिखा कर ब्राह्मणों को सहेजे रखा जा सकता है। ठाकुर वोटबैंक के लिए गृह मंत्री राजनाथ सिंह और खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए काफी होंगे। इस तरह से बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग पूरी तरह से फिट बैठ सकती है। लेकिन वही है कि वह इस मुहिम में कितनी जल्दी सफल हो पाती है। बताया जा रहा है कि अमित शाह के पिछले वाराणसी सहित यूपी दौरे में भी इस मुद्दे पर गहन मंत्रणा हुई थी।

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