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गांधीजी के जीवन से जुड़ी ये पांच बातें, आज भी देश के हर दिलों में जिंदा हैं बापू 

इरादों के पक्के थे महात्मा गांधी, भारतियों की स्वतंत्रता में बापू का रहा अविस्मरणीय योगदान 

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Sarweshwari Mishra

Oct 02, 2016

Mahatma gandhi

Mahatma gandhi

2 अक्टूबर यानि महात्मा गांधी का जन्मदिन गांधी जयंती या महात्मा गांधी जयंती के नाम से हर साल भारत में मनाया जाता है। महान व्यक्ति महात्मा गाँधी का जन्म वर्ष 1869 को पोरबन्दर में गुजरात में कर्मचन्द गांधी और पुतलीबाई के यहाँ हुआ था। महात्मा गांधी को भारतियों की स्वतंत्रता के लिए अपने अविस्मरणीय योगदान और संघर्ष के कारण भारत में बापू के नाम से जाना जाता है। महात्मा गांधी के जीवन के कुछ ऐसे सच हैं जिन्हें उन्होने अपने आत्मकथा में वर्णित तो किया है लेकिन आज भी कुछ लोग उनके उन पहलुओं से अछूते हैं।


Mahatma Gandhi
जब नकल न करने पर खुद को कहा वेबकूफ
गांधी जी हाईस्कूल के पहले ही वर्ष की परीक्षा के समय शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जाइल्स स्कूल में निरीक्षण करने आए थे। उन्होंने पहली कक्षा के विद्यार्थियों को अंग्रेजी के 5 शब्द लिखावाए। उनमें एक शब्द 'केटल' था। मैंने उसके हिज्जे गलत लिखे थे।


शिक्षक ने अपने बूट की नोक मारकर उन्हें सावधान किया। लेकिन वह क्यों सावधान होने लगे? उन्हें यह ख्याल ही नहीं हो सका कि शिक्षक मुझे पास वाले लड़के की पट्टी देखकर हिज्जे सुधार लेने को कह रहे हैं। उन्होंने यह माना था कि शिक्षक तो यह देख रहे हैं कि हम एक-दूसरे की पट्टी में देखकर चोरी न करें। सब लड़कों के पांचों शब्द सही निकले और अकेला वह बेवकूफ ठहरे। शिक्षक ने उनकी बेवकूफी बाद में समझाई, लेकिन उऩके मन पर कोई असर न हुआ। उन्होंने दूसरे लड़कों की पट्टी में देखकर चोरी करना कभी न सीख सका।


इतने पर भी शिक्षक के प्रति उनका विनय कभी कम न हुआ। बड़ों के दोष न देखने का गुण उनके स्वभाव में था। बाद में इन शिक्षक के दूसरे दोष भी उन्हें मालूम हुए थे। फिर भी उनके प्रति उनका आदर बना ही रहा। वह यह जानते थे कि बड़ों का आज्ञा का पालन करना चाहिए। वे जो कहें सो करना चाहिए उसके काजी न बनना।

Mahatma Gandhi
चोरी से शर्मसार होकर गांधी जी ने करनी चाही थी आत्महत्या
गांधी जी को एक बार उनके रिश्तेदार के साथ बीड़ी पीने का शौक लगा । उस समय उनके पास पैसे नहीं थे। उन्हें लगता था कि बीड़ी की गन्ध में बहुत आनन्द है । उन्हें तो सिर्फ धुआँ उड़ाने में कुछ मजा दिख रहा था। उनके काकाजी को बीड़ी पीने की आदत थी । उन्हें और दूसरो को धुआं उड़ाते देखकर गांधी जी भी बीड़ी फूकने की इच्छा हुई । गाँठ में पैसे तो थे नहीं, इसलिए काकाजी पीने के बाद बीड़ी के जो ठूंठ फैंका देखते उन्हें चुराना शुरू कर दिए।



धीरे-धीरे जब हर समय ठूठ कम मिलने लगा और जो मिलता उसमें ज्यादा धुंआ भी नहीं निकलता था। उस समय इन्हें चोरी की लत लग गई। नौकर की जेब में पड़े दो-चार पैसों में से एकाध पैसा चुराने की आदत डाली और बीड़ी खरीदने लगे । पर सवाल यह पैदा हुआ कि उसे संभाल कर रखें कहां । बड़ों के देखते तो बीडी पी ही नहीं सकते । जैसे-तैसे दो-चार पैसे चुराकर कुछ हफ्ते काम चलाया । इसी बीच सुना एक प्रकार का पौधा होता हैं जिसके डंठल बीड़ी की तरप जलते हैं और फूंके जा सकते है । उन्हें प्राप्त किया और फूंकने लगे ।


उससे भी संतोष नहीं हुआ । अपनी पराधीनता उन्हें अखरने लगी । दुःख इस बात का था कि बड़ों की आज्ञा के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते थे । अब वह उब गये और आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया। पर आत्महत्या कैसे करें? जहर कौन दें? सुना कि धतूरे के बीज खाने से मृत्यु होती हैं । जंगल में जाकर बीच ले आये । शाम का समय तय किया । केदारनाथजी के मन्दिर की दीपमाला में घी चढ़ाया , दर्शन कियें और एकान्त खोज लिया । पर जहर खाने की हिम्मत न हुई । अगर तुरन्त ही मृत्यु न हुई तो क्या होगा ? मरने से लाभ क्या ? क्यों न पराधीनता ही सह ली जाये ? फिर भी दो-चार बीज खाये । अधिक खाने की हिम्मत ही न पड़ी । दोनों मौत से डरे और यह निश्चय किया कि रामजी के मन्दिर जाकर दर्शन करके शान्त हो जाये और आत्महत्या की बात भूल जाये ।


एक किताब ने बदल दी गांधीजी की जिंदगी
गांधी जी को साधारणतः पाठशाला की पुस्तकों को छोड़कर और कुछ पढ़ने का शौक नहीं था। सबक याद करना चाहिए, उलाहना सहा नहीं जाता, शिक्षक को धोखा देना ठीक नहीं, इसलिए वह पाठ याद करते थे। लेकिन मन अलसा जाता, इससे अक्सर सबक कच्चा रह जाता। ऐसी हालत में दूसरी कोई चीज पढ़ने की इच्छा क्यों नहीं होती? किन्तु पिताजी की खरीदी हुई एक पुस्तक पर उनकी दृष्टि पड़ी। नाम था श्रवण-पितृभक्ति नाटक। उसे पढ़ने की उनकी इच्छा हुई और वह उसे बड़े चाव के साथ पढ़ गये। उन्हीं दिनों शीशे मे चित्र दिखाने वाले भी घर-घर आते थे। उनके पास भी श्रवण का वह दृश्य भी देखा, जिसमें वह अपने माता-पिता को कांवर में बैठाकर यात्रा पर ले जाते हैं।


दोनों चीजों का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा। मन में इच्छा होती कि श्रवण के समान बनना चाहिए। श्रवण की मृत्यु पर उसके माता-पिता का विलाप उन्हें स्मरण था। उस ललित छन्द को उन्होंने बाजे पर बजाना भी सीख लिया था। उऩ्हें बाजा सीखने का शौक था और पिताजी ने एक बाजा भी दिया था।

Mahatma Gandhi
जाति से किए गए बाहर
गांधी जी को विलायत जाने के सपने आते थे। एक दिन आया भी जब उन्हें विलायत जाने का मौका मिला। इस बीच जाति में खलबली मच गई। जाति की सभा बुलाई गई । अभी तक कोई मूढ़ बनिया विलायत नहीं गया था और गांधीजी जा रहे थे , इसलिए उनसे जवाब तलब पंचायत में हाजिर होने का हुक्म मिला । वह वहां गए । वे नहीं जानते थे कि उनमें अचानक हिम्मत कहां से आ गई । जाति के सरपंच ने कहा 'जाति का ख्याल हैं कि तूने विलायत जाने का जो विचार किया हैं वह ठीक नहीं हैं । हमारे धर्म में समुद्र पार करने की मनाही हैं , जिस पर यह भी सुना जाता है कि वहां पर धर्म की रक्षा नहीं हो पाती । वहां साहब लोगों के साथ खाना-पीना पड़ता हैं ।



गांधी जी ने जवाब दिया , 'मुझे तो लगता हैं कि विलायत जाने में लेशमात्र भी अधर्म नहीं है । मुझे तो वहां जाकर विद्याध्ययन ही करना है । फिर जिन बातों का आपको डर है उनसे दूर रहने की प्रतिक्षा मैने अपनी माताजी के सम्मुख ली है, इसलिए मैं उनसे दूर रह सकूंगा ।' विलायत जाने का अपना निश्चय मैं बदल नहीं सकता । मुझे अपनी माताजी और अपने भाई की अनुमति भी मिल चुकी हैं ।' सरपंच ने क्रोधित होकर गांधी जी से कहा कि तू जाति का हुक्म नहीं मानेगा? गांधी जी ने अपने जवाब में कहा मैं लाचार हूं।



इस जवाब से सरपंच गुस्सा हुए । सरपंच ने आदेश दिया, 'यह लड़का आज से जातिच्युत माना जायेगा । जो कोई इसकी मदद करेगा अथवा इसे बिदा करने जायेगा , पंच उससे जवाब तलब करेगे और उससे सवा रुपया दण्ड का लिया जायेगा ।'



कैसे पड़ा राजा हरिश्चन्द्र का प्रभाव
इन्हीं दिनों कोई नाटक कंपनी आई थी और उसका नाटक देखने की इजाजत उन्हें मिली थी। उस नाटक को देखते हुए वह थकते ही न थे। हरिश्चन्द्र का आख्यान था। उसे बार-बार देखने की इच्छा होती थी। लेकिन यूं बार-बार जाने कौन देता? पर अपने मन में उन्होंने उस नाटक को सैकड़ों बार खेला होगा।


हरिश्चन्द्र की तरह सत्यवादी सब क्यों नहीं होते? यह धुन बनी रहती। हरिश्चन्द्र पर जैसी विपत्तियां पड़ी, वैसी विपत्तियों को भोगना और सत्य का पालन करना ही वास्तविक सत्य हैं। उन्होंने यह मान लिया था कि नाटक में जैसा लिखी है, वैसी विपत्तियां हरिश्चन्द्र पर पड़ी होगी। हरिश्चन्द्र के दुःख देखकर उसका स्मरण करके वह खूब रोये भी। हरिश्चन्द्र कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं था। फिर भी उनके विचार में हरिश्चन्द्र और श्रवण जीवित रहे। उनके नाटक वे हमेशा पढ़ते और भाव-बिभोर हो जाते उनकी आंखे छलक जाती थीं।