गांधी जी को साधारणतः पाठशाला की पुस्तकों को छोड़कर और कुछ पढ़ने का शौक नहीं था। सबक याद करना चाहिए, उलाहना सहा नहीं जाता, शिक्षक को धोखा देना ठीक नहीं, इसलिए वह पाठ याद करते थे। लेकिन मन अलसा जाता, इससे अक्सर सबक कच्चा रह जाता। ऐसी हालत में दूसरी कोई चीज पढ़ने की इच्छा क्यों नहीं होती? किन्तु पिताजी की खरीदी हुई एक पुस्तक पर उनकी दृष्टि पड़ी। नाम था श्रवण-पितृभक्ति नाटक। उसे पढ़ने की उनकी इच्छा हुई और वह उसे बड़े चाव के साथ पढ़ गये। उन्हीं दिनों शीशे मे चित्र दिखाने वाले भी घर-घर आते थे। उनके पास भी श्रवण का वह दृश्य भी देखा, जिसमें वह अपने माता-पिता को कांवर में बैठाकर यात्रा पर ले जाते हैं।