देश में एक बार फिर से उठी है दलित विमर्श की आवाज। जगह-जगह हो रहीं गोष्ठियां। गैर भाजपाई मौजूदा सरकार को दलित विरोधी करार देने पर तुले हैं। खास तौर पर रोहित वेमुला प्रकरण के बाद से पूरे देश में दलित विरोध, दलित प्रेम, दलितोद्धार, राजनीति में आरक्षित सीट, गांधी, गांधी और अम्बेडकर, दलितों के इस्तेमाल, जातिवाद, वर्ण व्यवस्था, मनुवाद जैसे मसले बहस के केंद्र में है। इसी बीच मलयाम में यह फिल्म आई है जिसमें राष्ट्रपिता के प्रतीकात्मक पुतले को जूते की माला पहनाई गई फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया। यह फिल्म प्रदर्शित तो नहीं हुई है पर इन दिनों फिल्म की पटकथा पूरे देश में बहस का मुद्दा बन गई है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र इससे अछूता कैसे रहता। यहां भी मलयालम फिल्म राजनीतिक गलियारे में बहस का मुद्दा बनी है। कांग्रेसी इस पर खासे नाराज हैं। अगर ये कहें कि वे बौखलाएं हैं तो गलत नहीं होगा।
देश में अतिवाद का बोलबाला
राजनीति शास्त्री प्रो. सतीश कुमार इस तरह की घटनाओं को अतिवादी करार देते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में सांप्रदायिकता, जातीवाद, दलितवाद, मार्क्सवाद, गांधी, दलित जैसे तरह-तरह के अतिवादी घटनाक्रम संचालित हो रहे हैं। दरअसल ये वही लोग हैं जो कभी तिलक, तराजू और तलवार जैसे नारे दिया करते थे। वे गांधी और अम्बेडकर के वैचारिक मतभेदों को उभार कर नई राजनीतिक हवा देने का प्रयास कर रहे हैं। प्र. कुमार कहते हैं कि गांधी ने जो हरिजन शब्द दलितों के लिए दिया और अष्प्रिश्यता की समाप्ति की बात की तब उन्होंने हरिजन का अर्थ भी बताया, कहा कि हरिजन वो हैं जो भगवान के करीब हैं। साथ ही कहा कि जो सेवा का कर्म करते हैं वो भगवान के करीब हैं। लेकिन तब भी उनका विरोध हुआ था। अब पुनः गड़े मुर्दे उखाड़ कर गांधी और अम्बेडकर के मतभेदों को उजागर करने का प्रयास है जो नेशन बिल्डिंग में कहीं से उचित नहीं करार दिया जा सकता। यह फिल्म भी उसी सोच का नतीजा है।
ये पराजित लोगों की मानसिकता का द्योतक है
राजनीति शास्त्री प्रो. कौशल किशोर मिश्र कहते हैं कि वर्तमान में देश में विवादों का बोलबाला है। इसे गढ़ा जा रहा। ये काम और किसी का नहीं बल्कि पश्चिमी प्रभाव से ग्रस्त लोगों का है। वे लोग जो कल तक पश्चिमी सिद्धांतों को लागू करा कर उसका लाभ खुद कमाते रहे वे ही अब इस तरह की हवा दे रहे हैं। ये वही लोग हैं जो गांधी और दलित विरोध, अम्बेडकर-गांधी विवाद को आधार बना रहे हैं। इसमें कथित प्रगतिशील निर्माता निर्देशक, सिविल सोसाइटी के लोग हैं जो फिल्म, विश्वविद्यालयों, कलाकारों, और मीडिया को आधार बना कर देश में विशाक्त वातावरण पैदा कर रहे। दरअसल ये पराजित लोग हैं जो असल मुद्दों से लोगों का ध्यान बांटना चाहते हैं। इन्हें भ्रष्टाचार, आतंकवाद,भूख नहीं दिखती। ये दरअसल राजनीतिक, सामाजिक प्रादुर्भाव नहीं धन कमाने का जरिया मात्र है। ये विखंडनवाद को पैदा करने वाले लोग हैं कभी रोहित वेमुला तो कभी कन्हैया के बहाने भारत माता की जय, आजादी, पाकिस्तान जिंदाबाद, धर्म पर महिलाओं के आक्षेप लगाने का काम कर रहे। प्रो.मिश्र कहते हैं कि ये दलित उभार पैदा कर राजनीतिक समीकरकण बना रहे हैं। इसी तरह मुस्लिम समीकरण बनाया जा रहा है। यह फिल्म भी इसी का रूप है।