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राष्ट्रपिता गांधी को जूते की माला

राष्ट्रपिता की आलोचना, किसने पहनाई ये जूते की माला, क्या है मामला जानने को देखें patrika.com......

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Ajay Chaturvedi

Apr 18, 2016

gandhi

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वाराणसी. इन दिनों देश भर में राष्ट्रपिता मोहन दास करमचंद गांधी पर तीखी बहस छिड़ी है। खास तौर पर दलित वर्ग में बापू को लेकर बहस को हवा दी जा रही है। इतना ही नहीं मलयालम में बापू पर एक फिल्म बनी है जिसमें उनके पुतले पर जूते की माला पहनाए हुए दर्शाया गया है। इसे लेकर पक्ष और विपक्ष में बहस जोरों पर है।

गांधी के पुतले को पहनाया जूते की माला
बता दें कि हाल ही में दलित और गांधी पर आधारित एक फिल्म मलयालम में बनाई गई है। फिल्म का नाम है, 'पैपिलॉन बुद्ध'। इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने खारिज कर दिया है। सेंसर बोर्ड का तर्क है कि इस फिल्म में गांधी का अपमान किया गया है। गांधी के प्रतीकात्मक पुतले को जूतों की माला पहनाई गई है, साथ ही पुतले को जलाया गया है। ऐसे में इस फिल्म को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
फिल्म निर्देशक का विचार
फिल्म के निर्देशक हैं जयन चेरियन। इनका कहना है कि गांधी के विचारों और दलितों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं के बीच लंबे समय से मतभेद रहा है। ऐसे में हमने इसी को उभारा है। कहते हैं कि ये विरोधाभास क्यों? दलितों को च्हरिजनज् यानी भगवान के बच्चे कहने वाले गांधी से वही समुदाय नाराज़ क्यों है? क्यों दलितों को लगता है कि उनके समुदाय के लिए किए गए गांधी के प्रयास दरअसल ऐतिहासिक गलतियां थीं?

दलित और महात्मा गांधी
देश में एक बार फिर से उठी है दलित विमर्श की आवाज। जगह-जगह हो रहीं गोष्ठियां। गैर भाजपाई मौजूदा सरकार को दलित विरोधी करार देने पर तुले हैं। खास तौर पर रोहित वेमुला प्रकरण के बाद से पूरे देश में दलित विरोध, दलित प्रेम, दलितोद्धार, राजनीति में आरक्षित सीट, गांधी, गांधी और अम्बेडकर, दलितों के इस्तेमाल, जातिवाद, वर्ण व्यवस्था, मनुवाद जैसे मसले बहस के केंद्र में है। इसी बीच मलयाम में यह फिल्म आई है जिसमें राष्ट्रपिता के प्रतीकात्मक पुतले को जूते की माला पहनाई गई फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया। यह फिल्म प्रदर्शित तो नहीं हुई है पर इन दिनों फिल्म की पटकथा पूरे देश में बहस का मुद्दा बन गई है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र इससे अछूता कैसे रहता। यहां भी मलयालम फिल्म राजनीतिक गलियारे में बहस का मुद्दा बनी है। कांग्रेसी इस पर खासे नाराज हैं। अगर ये कहें कि वे बौखलाएं हैं तो गलत नहीं होगा।

देश में अतिवाद का बोलबाला

राजनीति शास्त्री प्रो. सतीश कुमार इस तरह की घटनाओं को अतिवादी करार देते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में सांप्रदायिकता, जातीवाद, दलितवाद, मार्क्सवाद, गांधी, दलित जैसे तरह-तरह के अतिवादी घटनाक्रम संचालित हो रहे हैं। दरअसल ये वही लोग हैं जो कभी तिलक, तराजू और तलवार जैसे नारे दिया करते थे। वे गांधी और अम्बेडकर के वैचारिक मतभेदों को उभार कर नई राजनीतिक हवा देने का प्रयास कर रहे हैं। प्र. कुमार कहते हैं कि गांधी ने जो हरिजन शब्द दलितों के लिए दिया और अष्प्रिश्यता की समाप्ति की बात की तब उन्होंने हरिजन का अर्थ भी बताया, कहा कि हरिजन वो हैं जो भगवान के करीब हैं। साथ ही कहा कि जो सेवा का कर्म करते हैं वो भगवान के करीब हैं। लेकिन तब भी उनका विरोध हुआ था। अब पुनः गड़े मुर्दे उखाड़ कर गांधी और अम्बेडकर के मतभेदों को उजागर करने का प्रयास है जो नेशन बिल्डिंग में कहीं से उचित नहीं करार दिया जा सकता। यह फिल्म भी उसी सोच का नतीजा है।

ये पराजित लोगों की मानसिकता का द्योतक है
राजनीति शास्त्री प्रो. कौशल किशोर मिश्र कहते हैं कि वर्तमान में देश में विवादों का बोलबाला है। इसे गढ़ा जा रहा। ये काम और किसी का नहीं बल्कि पश्चिमी प्रभाव से ग्रस्त लोगों का है। वे लोग जो कल तक पश्चिमी सिद्धांतों को लागू करा कर उसका लाभ खुद कमाते रहे वे ही अब इस तरह की हवा दे रहे हैं। ये वही लोग हैं जो गांधी और दलित विरोध, अम्बेडकर-गांधी विवाद को आधार बना रहे हैं। इसमें कथित प्रगतिशील निर्माता निर्देशक, सिविल सोसाइटी के लोग हैं जो फिल्म, विश्वविद्यालयों, कलाकारों, और मीडिया को आधार बना कर देश में विशाक्त वातावरण पैदा कर रहे। दरअसल ये पराजित लोग हैं जो असल मुद्दों से लोगों का ध्यान बांटना चाहते हैं। इन्हें भ्रष्टाचार, आतंकवाद,भूख नहीं दिखती। ये दरअसल राजनीतिक, सामाजिक प्रादुर्भाव नहीं धन कमाने का जरिया मात्र है। ये विखंडनवाद को पैदा करने वाले लोग हैं कभी रोहित वेमुला तो कभी कन्हैया के बहाने भारत माता की जय, आजादी, पाकिस्तान जिंदाबाद, धर्म पर महिलाओं के आक्षेप लगाने का काम कर रहे। प्रो.मिश्र कहते हैं कि ये दलित उभार पैदा कर राजनीतिक समीकरकण बना रहे हैं। इसी तरह मुस्लिम समीकरण बनाया जा रहा है। यह फिल्म भी इसी का रूप है।

राजनीति में आरक्षित सीटों का विरोध गांधी ने किया था
विद्वानों का मत है कि भारत की राजनीति में दलितों के लिए आरक्षित सीटों की मौजूदा व्यवस्था का विरोध सबसे पहले 1932 में महात्मा गांधी ने ही किया था। तब उन्होंने इसके विरुद्ध अनशन तक पर बैठे। लेकिन आधुनिक दौर में दलित कार्यकर्ता इसे एक ऐतिहासिक भूल करार देते हैं। मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में एक व्यक्ति-एक वोटज् के तहत सभी नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है। आरक्षित सीटों पर भी सभी जाति, धर्म और विचारधाराओं को मानने वाले अपना वोट देते हैं। लेकिन दलित सरोकारों पर किताबें छापने वाले नवयन प्रकाशन के एस आनंद के मुताबिक सीटों में आरक्षण से दलितों को चुनाव जीतने का मौका तो मिलता है, लेकिन मतदाताओं में दलितों की संख्या कम होने की वजह से वो ही दलित नेता चुने जाते हैं जो बहुसंख्यकों की पसंद हैं।

क्या है अम्बेडकर का प्रस्ताव
राजनीति में दलितों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए वर्ष 1932 में दलित नेता डॉ. बीआर अंबेडकर ने एक अलग प्रस्ताव रखा था। इसके तहत सीटों में आरक्षण की बजाय दलितों को अपना प्रतिनिधि अलग से चुनकर (सेपरेट इलेक्टोरेट) भेजने की व्यवस्था सुझाई गई थी जिसे हरी झंडी भी मिल गई थी। लेकिन महात्मा गांधी ने इसका विरोध कर अनशन किया और आखिर उनकी बात मान ली गई। एस आनंद कहते हैं कि गांधी अगर विरोध नहीं करते और अम्बेडकर के प्रस्तावित रास्ते को अपना लिया जाता तो दो दशकों में एक मज़बूत और सच्चा दलित नेतृत्व उभरता जो दलित सरोकारों को आगे ले जाने में रुचि रखता। लेकिन मौजूदा स्थिति में आरक्षित सीटों पर वही लोग चुने जा रहे हैं जिनके पास पर्याप्त संख्या है और वे अपने समुदाय को लेकर वचनबद्ध नहीं हैं।

हरिजन कहलाना गाली समान
दलित समुदाय के लोगों को अस्पृश्य या अछूतज् कहकर संबोधित करने को महात्मा गांधी ने गलत बताते हुए उन्हें हरिजन यानी भगवान के बच्चे की संज्ञा दी. हरिजन नाम से उन्होंने तीन पत्रिकाएं भी निकालीं। लेकिन दलित नेता बाबा साहेब अम्बेडकर की पोती रमा के पति और दलित कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बड़े के मुताबिक दलितों को हरिजनज् कहलाना बर्दाश्त नहीं है और वे उसे च्गालीज् के समान मानते हैं, इसीलिए च्हरिजनज् अब आम शब्दावली में इस्तेमाल नहीं किया जाता। तेलतुम्बड़े कहते हैं कि सिर्फ नाम बदलने से कुछ नहीं होता, गांधी के मुताबिक हरिजनज् यानी भगवान के बच्चे का सांकेतिक अर्थ था कि सभी समान हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और थी, इसलिए अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने भी इसका विरोध किया। आनंद तेलतुम्बड़े के मुताबिक दलितों का जीवन उनकी जाति से जुड़े व्यवसाय के जाल से निकल नहीं पा रहा था, दलितों के लिए उच्च जातियों की इस तरह की पहल का मतलब था मानो दुखती रग पर चोट करना क्योंकि पिछड़ी जातियों के जीवन में कोई मूलभूत बदलाव की बात नहीं की जा रही थी।

गांधी के विचार
गांधी का मानना था कि कोई भी काम बुरा नहीं है फिर चाहे वो मैला ढोने का ही क्यों ना हो, इसीलिए उन्होंने खुद ये काम करने जैसे सांकेतिक कदम उठाए।


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