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जानिए कब और कैसे हुआ प्रभु यीशु का जन्म

यूसुफ की मंगेतर थी मरियम, आत्मा की ओर से गर्भवती हुई थी मरियम

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Sarweshwari Mishra

Dec 25, 2016

Jesus Birthday

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वाराणसी. खुशी और उत्साह का प्रतीक क्रिसमस ईसाई समुदाय का सबसे बड़ा त्योहार है। ईसाई समुदाय इसे यीशु के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। क्या आप जानते हैं ‍कि मसीह यीशु का जन्म कैसे हुआ। आज से हजारों साल पहले नासरत में गेब्रियल नामक एक स्वर्गदूत ने मरियम को दर्शन दिया और कहा कि तू पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती होगी और एक पुत्र जन्म देगी, ‍उसका नाम यीशु रखना।



उस समय ‍मरियम यूसुफ की मंगेतर थी। यह खबर सुनते ही यूसुफ ने बदनामी के डर से मरियम को छोड़ने का मन बनाया। लेकिन उसके विचारों को जानकर उसी स्वर्गदूत ने यूसुफ से कहा कि मरियम पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती है उसे अपने यहां लाने से मत डर। स्वर्गदूत की बात मानकर यूसुफ मरियम को ब्याह कर अपने घर ले आया।



उस समय नासरत रोमन साम्राज्य का हिस्सा था। ‍मरियम की गर्भावस्था के दौरान ही रोम राज्य की जनगणना का समय आ गया। तब नियमों के चलते यूसुफ भी अपनी पत्नी मरियम को लेकर नाम लिखवाने येरूशलम के बैतलहम नगर को चला गया। सराय में जगह न मिलने के कारण उन्होंने एक गौशाले में शरण ली।



बैतलहम में ही मरियम के जनने के दिन पूरे हूए और उसने एक बालक को जन्म दिया और उस बालक को कपड़े में लपेटकर घास से बनी चरनी में लिटा दिया और उसका नाम यीशु रखा। पास के गरड़‍ियों ने यह जानकर कि पास ही उद्धारकर्ता यीशु जन्मा है जाकर उनके दर्शन किए और उन्हें दण्डवत किया।



यीशु के जन्म की सूचना पाकर पास देश के तीन ज्योतिषी भी येरूशलम पहुंचे। उन्हें एक तारे ने यीशु मसीह का पता बताया था। उन्होंने प्रभु के चरणों में गिरकर उनका यशोगान किया और अपने साथ लाए सोने, मुर व लोबान को यीशु मसीह के चरणों में अर्पित किया।



यही वजह है कि हमें क्रिसमस की झांकियों में चरनी, भेड़, गाय, गरेड़िया, राजा दिखाई देते हैं। क्रिसमस पर तारे का भी बहुत महत्व है। क्योंकि इसी तारे ने ईश्वर के बेटे यीशु मसीह के धरती पर आगमन की सूचना दी थी।


प्रभु यीशु के पिता का जीवन
मरियम के पति, यानी यीशु का दत्तक-पिता यूसुफ बढ़ई के काम में काफी हुनरमंद थे। वह खूब परिश्रम करते और अपने परिवार का गुज़ारा कर सका। आगे चलकर उसके पांच बेटे का जिक्र पवित्र पुस्तक बाइबल में मिलता है। उनकी दो बेटियां भी थीं।



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मरियम की तरह यूसुफ भी आध्यात्मिक व्यक्ति थे। इसलिए, हर साल फसह में अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करते थे। उस समय मां मरियम को नौ महीने का गर्भ होने की वजह से बहुत तकलीफ हो रही थी, फिर भी उन्होंने और यूसुफ ने एक विद्वान कैसर का हुक्म मानते हुए, यूसुफ के पूर्वजों के शहर, बैतलहम तक की यात्रा की।


जब वे वहां पहुंचे, तो उस भीड़-भाड़वाले शहर में उन्हें ठहरने की कोई जगह नहीं मिली। इसलिए हालात से मजबूर होकर वे एक पशुशाला में ही ठहरे। वहीं पर यीशु का जन्म हुआ।

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